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Video : वागड़ के लोकगीतों में छुपा है संदेशों का खजाना, कलाकारों का अंदाज कर देता है हर किसी को दीवाना

विश्व संगीत दिवस पर विशेष

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banswara

Video : वागड़ के लोकगीतों में छुपा है संदेशों का खजाना, कलाकारों का अंदाज कर देता है हर किसी को दीवाना

बांसवाड़ा. वागड़ का लोक संगीत...। केवल गायन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संदेशों का खजाना है। परिवारों में सहयोग की भावना विकसित करने के संदेशपरक हलमा गीत ‘थारे परणियों ते कर हीयू रे.. ’ । होली पर फागण की मस्ती का गान ‘ मारे माते ओरन वाजे...’ और गलालेंग की गायिकी के ‘लालसिंग ना सवा गलालेंग, जगत में अमर नाम है जी’....जैसे स्वरों के साथ समृद्ध गायिकी की फेहरिस्त है। कंदुरू, कांवड़, मंजीरा, कुण्डी, मंजिरा, तंबूरा, ढोलक एवं थाली की संगत के साथ मधुर गायिकी लोगों को घंटों बांधे रखती है, लेकिन वक्त के साथ इस गायिकी को प्रोत्साहित करने के मामले में किसी प्रकार का ध्यान केंद्रित नहीं किया जा रहा है। विश्व संगीत दिवस पर वागड़ में लोक गायिकी की पन्ने पलटे तो कई जानकारियां सामने आई।

उम्र 75 वर्ष, आज भी गायन
75 वर्ष की रकमा बाई बताती है कि दिल्ली, मुम्बई, उड़ीसा, देहरादून सहित कई जगह लोक संगीत की प्रस्तुतियां दी हंै। महिला एवं पुरुष कलाकारों का कहना है कि पूर्व के वर्षों में जिले के हर ब्लॉक में लोक गीतों के गायक कलाकारों की टीम हुआ करती थी, लेकिन अब प्रोत्साहन के अभाव में गिनती के ही रह गए हैं।

12 से शुरू, अब 70 हो गए तैयार
देहात से लेकर दिल्ली तक नापला गांव के तीस सदस्यों का दल लोक संगीत की विशेष प्रस्तुति देता है। नापला के खेमराज डिंडोर बताते हैं कि शादी-ब्याह में गीतों को सुनने के बाद इसकी शुरुआत की गई। 1983 में 12 सदस्यों की टीम ने देहरादून में प्रस्तुति दी थी। वर्तमान में 70महिला पुरुष कलाकार हैं। कार्यक्रमों में प्रोत्साहन राशि एवं प्रशस्ति पत्र तो मिलते हैं, सरकार को इस विधा को आगे लाने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए, ताकि कलाकारों में उत्साह बढ़े।

कई गांवों में लोक संगीत के दक्ष
जवाहर कला केंद्र की ओर से कराए गए सांस्कृतिक सर्वेक्षण में भी बड़ी सरवा, टीमेडा बड़ा, मुंदड़ी, पाटन, ठुम्मठ, मोहकमपुरा, कोटड़ा, कदवाली खुर्द, सबलपुरा, कुशलापाड़ा, कलिंजरा, उकाला, लोहारिया सहित अनेक गांवों के लोक संगीत में विशेष दक्षता रखने वाले कलाकारों ने नाम दर्ज कराकर विशेष पहचान अर्जित की है। गाथा गान, वंशावली गीत सहित लोक संगीत की अन्य विधाओं में भी कई लोग दक्षता रखते हैं।

समृद्ध है वागड़ का लोक संगीत
अभिनव शिक्षा समिति की सचिव मालिनी काले ने बताया कि भारतीय संगीत की दो प्रमुख विधाएं प्राचीन वैदिक काल से ही प्रचलित हैं। इसमें एक शास्त्रीय एवं दूसरी लोक संगीत के रूप में मुखरित हुई हैं। बांसवाड़ा राजस्थान के वागड़ क्षेत्र के नाम से जाना पहचाना जाता है। यहां की एक अलग से सांस्कृतिक परंपरा रही है। जनजाति संगीत का लोक पक्ष वैदिक संगीत के तीन स्वरों पर गाया जाने वाला लोकगीत है। इनके जन्म संस्कार से मृत्यु पर्यंत के गीत एवं मेले, त्योहार, पर्व, धर्म से संबंधित गीतों की अनूठी विशेषता रही है। आज भी रातीजगा के अवसर पर गाए जाने वाले गीत भी विशेष महत्व रखते हंै। वंशावली गीत, गलालेंग गाथा सहित अन्य गीत अनूठे गायन-वादन के कारण ही अन्य से अलग हंै एवं खास पहचान रखती हैं। वागड़ के संगीत को बचाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एवं अन्य अवसरों पर इसकी अधिक से अधिक जानकारी साझा की जाती हैं।