
बांसवाड़ा : हद है... 15-20 रुपए किलो का गेहूं छोड़, 5 रुपए का गुटखा 75 में लेने की दौड़
बांसवाड़ा. कोरोना संक्रमण के लॉक डाउन में जर्दा-गुटखा की बिक्री पर प्रतिबंध ने व्यसन मुक्ति की नई राह खोली थी, लेकिन अब भी कई ऐसे दुकानदार हैं, जो गुपचुप तरीके इसकी बिक्री करने के साथ ही मुनाफा कमा रहे हैं। शर्मनाक बात यह भी है कि कई परिवार कोरोना संक्रमण में खाद्यान्न की कमी पूरी करने के लिए 15-20 रुपए प्रति किलो गेहूं की खरीदी से दूरी बनाकर 5 रुपए की जर्दा-गुटखे की पुडिय़ा 75 रुपए तक खरीद कर व्यसन के जद में स्वयं को फंसा रहे हैं। राजस्थान पत्रिका ने देहात से शहर तक पड़ताल की तो कुछ ऐसी ही चौकाने वाली स्थितियां सामने आई।
यह तो महज बानगी है....
शहर के दाहोद मार्ग, डूंगरपुर रोड, उदयपुर मार्ग, जयपुर मार्ग सहित शहर की भीतरी कॉलोनियों में इक्का-दुक्का खुली छोटी-बड़ी दुकानों पर 5 रुपए का जर्दा व गुटखा 55 से लेकर 75 रुपए तक गुपचुप बिक रहा है। इसके अलावा शहर से सटे गांवों में भी इसकी बिक्री हो रही हैं। गढ़ी उपखण्ड के डडूका सहित आसपास के गांवों में पांच रुपए का गुटखा-तंबाकू 25 रुपए से 75 रुपए तक मिल रहा है। खास बात यह है कि इतनी अधिक कीमत वसूलने के बावजूद लोग इसकी खरीदारी कर व्यसन स्वयं को मौत के मुंह में धकेल रहे हंै।आनंदपुरी, कुशलगढ़, तलवाड़ा, जौलाना, गांगड़तलाई, घाटोल सहित कई क्षेत्रों में ऊंचे दामों पर बिक्री हो रही हैं। कई दुकानदार प्रतापगढ़ सहित अन्य जिलों से भी संपर्क कर गुटखा-तंबाकू मंगवाकर ऊंचे दामों पर उपलब्ध करा रहे हैं।
सख्ती के बावजूद गुपचुप बिक्री
गत दिनों बांसवाड़ा जिला मुख्यालय पर दो होलसेल गुटखा-जर्दा के व्यापारियों के गोदाम पर कार्रवाई की थी। ऐसी ही कार्रवाई घाटोल में एक दुकान पर हो चुकी है। रोहनवाड़ी क्षेत्र में भी गुटखे का पैकेट लेकर जाते एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा चुका हैं, इसके बावजूद अब भी कई छोटी-बड़ी दुकानों पर इसकी बिक्री हो रही हैं। कई लोगों ने स्टॉक भी रख रखा हैं। खास बात यह भी है कि कार्रवाई के डर से गुटखा-तंबाकू बेचने वाले पहले पूरी जानकारी लेते हैं, उसके बाद तसल्ली पर ऊंचे दामों पर उपलब्धता करा रहे हैं।
कैंसर से बचने का यह बेहतरीन मौका
एमजी अस्पताल बांसवाड़ा के कैंसर केयर यूनिट की प्रभारी डॉ. पुष्पा चरपोटा का कहना है कि तम्बाकू उत्पादों से ओरल कैंसर होता है, यह सर्वविदित है। लॉकडाउन में ही बांसवाड़ा में चार नए केस में से दो ओरल कैंसर से पीडि़त पाए गए हैं। अब जबकि बिक्री पर ही रोक है, कई गुना दाम देकर कैंसर को न्यौता देने से बेहतर यही है कि इस समय में तंबाकू उत्पाद छोडकऱ वागड़ के लोग पैसा और सेहत दोनों को बचाएं।
पत्रिका व्यू.... सरकार की इच्छा शक्ति से ‘नया सवेरा’ की फिर जरूरत
समाज को नशामुक्त बनाने के लिए सरकार की इच्छा शक्ति भी जरूरी है। इससे पहले डोडा पोस्त की खपत भी इसका उपभोग करने वालों के लिए दुखदायी रही है। नशे के आदी लोग अफीम महंगी होने पर आबकारी से अधिकृत दुकानों से डोडा पोस्त खरीदते थे और उसे उबालकर पीते हुए नशा करते रहे। इसके दुष्परिणाम ज्यादा दिखलाई दिए तो सरकारों ने पहले डोडा पोस्त के ठेके और अपनी दुकानों पर विक्रय बंद किया। साथ ही ‘नया सवेरा’ स्क्रीम लागू कर डोडा पोस्त की लत के शिकार लोगों को घरों से निकालकर अस्पतालों में उपचार कराया। इसमें कुछ वर्ष भले ही लगे, लेकिन इससे रोग की यह जड़ पूरी तरह खत्म हो गई। इससे सरकारों को रेवेन्यू का थोड़ा नुकसान जरूर हुआ, लेकिन करीब पांच-सात वर्षों से इसके नतीजे में बढ़ते रोगियों के उपचार का खर्च भी बचने लगा। अब फिर वैसे ही रोक के कदम की जरूरत है। सूत्र बताते हैं कि सरकार तम्बाकू उत्पादों पर स्थायी रोक इसलिए नहीं लगाती कि उसे इन पर डेढ़ सौ से दो सौ फीसदी टैक्स मिल रहा है। हालांकि इसके नतीजे में कैंसर सहित तंबाकू उत्पादों से हो रही अन्य बीमारियों के उपचार पर उसे ही करोड़ों का खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में अब कोरोना के बाद आने वाले नए दौर की बेहतरी के लिए आय के दूसरे स्रोत बनाकर सरकार को कैंसर के मूल कारण को समाप्त करने इच्छा शक्ति जागृत करनी चाहिए। तभी लोक कल्याणकारी राज्य के मायने साबित होंगे।
Published on:
28 Apr 2020 03:07 pm
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