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राजस्थान में यहां पॉलिथीन के खिलाफ महिलाओं की अनोखी मुहिम, पांच साल में कपड़ों के 15000 थैले बांटे

Rajasthan News : राजस्थान में आदिवासी अंचल बांसवाड़ा में नारी शक्ति ने पर्यावरण संरक्षण की ओर सशक्त कदम बढ़ाया है। ये छह महिलाएं बीते पांच वर्ष से कपड़े के करीब 15 हजार थैले बनाकर लोगों को बांट चुकी हैं। बच्चों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से स्कूलों में भी मुहिम चला रही हैं।

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Rajasthan Banswara Unique campaign of women against polythene 15000 bags of clothes distributed in five years

बांसवाड़ा. सिलाई के बाद थैलियां दिखातीं संगठन की महिलाएं और थैली वितरण के दौरान सब्जी विक्रेताओं को और ग्रामीणों को जागरूक करतीं। 

Banswara News : प्रदेश के आदिवासी अंचल बांसवाड़ा में नारी शक्ति ने पर्यावरण संरक्षण की ओर सशक्त कदम बढ़ाया है। ये छह महिलाएं बीते पांच वर्ष से समाज सेवा की डगर पर चलकर पॉलिथीन के खिलाफ युद्ध छेड़ चुकी हैं, ताकि ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूक किया जा सके। अभी तक कपड़े के करीब 15 हजार थैले बनाकर लोगों को बांट चुकी हैं। बच्चों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से स्कूलों में भी मुहिम चला रही हैं। कपड़े के थैलों के लिए कपड़े एकत्रित करने से लेकर बनाने और वितरित करने का काम महिलाएं ही करती हैं।

महावीर इंटनेशनल बांसवाड़ा केंद्र की अध्यक्ष भुवनेश्वरी मालोत बताती हैं कि हम छह महिलाएं, सुधा तलवाडिय़ा, ऋषिकन्या व्यास, गीता चौधरी और संध्या लोकवानी मिलकर थैलों के कार्य देखती हैं। इसमें सबसे पहले रिदाओं को छांटकर अलग करते हैं। फिर उन्हें सिलाई के लिए भेजते हैं। इनके द्वारा 'पॉलिथीन मुक्त हो बांसवाड़ा' मुहिम चलाई जा रही है।

बोहरा समाज का भी पूर्ण सहयोग, हर रोज देते हैं रिदा

केंद्र अध्यक्ष मालोत बताती हैं कि पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा के कार्य में बोहरा समाज भी पूर्ण सहयोग करता है। समाज की महिलाएं स्व प्रेरित होकर रिदा (बोहरा समाज की महिलाओं का लिवास) उन तक पहुंचाती है। इस कार्य में समाज तीन महिलाएं काफी सक्रिय हैं। महीनें में 30-40 रिदा हम तक पहुंचाई जाती हैं। समाज सेवा कार्य में अन्य कई महिलाओं को रोजगार भी मुहैया कराया जा रहा है। सिलाई करने वाली महिलाओं को भुगतान भी किया जाता है।

आर्थिक भार संगठन की महिलाएं मिलकर उठाती हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सिलाई में दक्ष इन महिलाओं को संगठन की ओर से ही प्रशिक्षित भी किया गया है। जो अब अपने पैरों पर खड़े होकर आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं। महिलाएं बच्चोंं की फ्रॉक और झबले, कुर्ता, बेबी किट इत्यादि भी वितरित करती हैं।

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