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Rajasthan: मानसून में अच्छी बारिश के लिए करवाते मेंढक-मेंढकी की शादी, जानिए वागड़ की अनोखी परंपराएं

Rajasthan Rain Rituals: राजस्थान का वागड़ अंचल अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, तीज-त्योहारों और सामाजिक समरसता को दर्शाने वाली सप्तरंगी परम्पराओं के लिए प्रदेशभर में विशेष पहचान रखता है। ठीक उसी तरह यहां मानसून की अच्छी मेहर के लिए निभाई जाने वाली लोक परम्पराएं भी अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं।
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बांसवाड़ा

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Anand Prakash Yadav

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Updated: 17 Jun 2026, 1:04 PM IST

Indigenous Traditions Rajasthan

राजस्थान में अच्छी बारिश के लिए अनुठी परम्परा, पत्रिका फोटो

Rajasthan Rain Rituals: राजस्थान का वागड़ अंचल अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, तीज-त्योहारों और सामाजिक समरसता को दर्शाने वाली सप्तरंगी परम्पराओं के लिए प्रदेशभर में विशेष पहचान रखता है। ठीक उसी तरह यहां मानसून की अच्छी मेहर के लिए निभाई जाने वाली लोक परम्पराएं भी अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिले के अनेक गांवों में जनजाति समाज के साथ ही सर्व समाज इन्द्र को रिझाने तरह-तरह के जतन करता हैं। कई परम्पराओं के निर्वहन दौरान जल्द बारिश नहीं होने पर इन्द्रदेव को बाल एवं सखा भाव से चुनौती भी दी जाती है। कुछ खास परम्पराओं पर रिपोर्ट…

मेढक-मेंढकी का करवाते हैं विवाह

बांसवाड़ा शहर के डेगली माता चौक में ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच मेढक-मेंढकी का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है। परम्परा के अनुसार दोनों को पहले जल और फिर चमेली के इत्र से स्नान कराया जाता है। इसके बाद पैरों में लच्छा बांधा जाता है तथा कुमकुम का तिलक लगाया जाता है। सगाई की रस्म निभाने के बाद मंडप सजाकर मंत्रोच्चार के साथ सात फेरे करवाए जाते हैं। विवाह समारोह में शामिल लोगों का फूलमालाओं से स्वागत भी किया जाता है।

पुरुष वेश में धाड़ निकालती हैं महिलाएं

बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिले के अनेक गांवों में जनजाति महिलाएं पुरुषों का वेश धारण कर हाथों में तलवारें एवं बांस की लकड़ियां लेकर गांव में धाड़ निकालती हैं। महिलाओं की यह टोली विभिन्न मंदिरों में पूजा-अर्चना करती हुई पूरे गांव का भ्रमण करती है। ग्रामीण मानते हैं कि धाड़ निकलने के बाद शीघ्र ही वर्षा होती है।

डेढ़क माता की सवारी के साथ बनाते हैं घुघरी

डूंगरपुर शहर के सुथारवाड़ा क्षेत्र में मानसून को मनाने के लिए घुघरी बनाने की परम्परा निभाई जाती है। आयोजन से एक दिन पहले गोबर से प्रतीकात्मक ‘डेढक माता’ की प्रतिमा बनाई जाती है, जिसे घर-घर ले जाया जाता है। महिलाएं प्रतिमा पर जल छिड़ककर अनाज अर्पित करती हैं। एकत्रित अनाज से अगले दिन घुघरी बनाई जाती है और इन्द्रदेव को भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दौरान शोभायात्रा निकालकर गेपसागर की पाल पर गंगा मैया का आह्वान भी किया जाता है।

शिवलिंग को करते हैं जलमग्न

वागड़ अंचल में वर्षा नहीं होने पर कई मंदिरों में गर्भगृह की जल निकासी बंद कर शिवलिंग को जलमग्न किया जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान शिव प्रसन्न होकर वर्षा का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए मंदिरों में हवन, यज्ञ और पर्जन्य अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं। कई स्थानों पर श्रद्धालु पानी से भरे बड़े पात्रों में बैठकर पर्जन्य याग करते हैं तथा अच्छी वर्षा और समृद्धि की कामना करते हैं।

सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण

वर्षा को आमंत्रित करने वाली ये लोक परम्पराएं केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वागड़ की सामूहिक संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान को भी अभिव्यक्त करती हैं। आधुनिकता के इस दौर में भी इन परम्पराओं का जीवंत बने रहना क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है।

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