
चार वेदों के बारे में यह दुर्लभ जानकारी नहीं होगी आपको, खबर पढकऱ आप भी चल पड़ेंगे वेदों के अध्ययन की राह पर
बांसवाड़ा. चार वेदों के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन उनके अध्ययन की प्रक्रिया से अधिकांश लोग अनभिज्ञ हैं। किसी भी वेद के अध्ययन या कंठस्थ करने में एक शाखा का ही अध्ययन कराया जाता है। किसी व्यक्ति को कौन से वेद की कौनसी शाखा का अध्ययन कराना है, उसका पता उसके कुल से लगता है। प्रत्येक कुल के पूर्वज वेद की जिस शाखा का अध्ययन करते आए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी वेद की उस शाखा का ही अनुसरण किया जाता रहा है। यह कहना है रामानुज संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी में व्याकरण विभागाध्यक्ष डॉ. ज्ञानेंद्र सापकोटा का। वे बताते हैं कि विद्यार्थी के कुल के बुजुर्ग लोग इससे अवगत रहते हैं कि उनके पूर्वज कौन से वेद की कौनसी शाखा पढ़ते थे। यदि किसी को ज्ञात नहीं है तो शाखा का पता लगाया जाता है। लेकिन जानकारी नहीं मिलने की स्थिति में वेदों में विकल्प भी है।
वेदांग भी आवश्यक
डॉ. सापकोटा ने बताया कि कुल अनुसार वेद शाखा का अध्ययन के साथ ही वेदांग भी आवश्यक होता है। जिसे कुल छह विभागों में विभक्त किया है। जिसमें व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, निरुक्ता, शिक्षा और कल्प हैं।
मंत्रों का रटना नहीं
डॉ. सापकोटा बताते हैं कि अधिकांश लोगों में भ्रांति है कि वेद अध्ययन का मतलब मंत्रों को रटना होता है। जबकि इसके अध्ययन के साथ ही मंत्रों के पीछे के विज्ञान और इसके गूढ़ का समझना भी है, ताकि वेदों में दी गई शिक्षाओं को जीवन में उतार आमजन के हितार्थ उपयोग में लाया जा सके।
यूं समझें वेद
ऋगवेद में 21, सामवेद में1000, अथर्ववेद में 09 और यजुर्वेद में 101 शाखाएं हैं। यजुर्वेद को दो खंडों में विभाजित किया गया है। जिसमें शुक्ल यजुर्वेद की 15 और कृष्ण यजुर्वेद की 86 शाखाएं हैं।
‘विज्ञों से मिली प्राणवायु, समापन 29 को’
बांसवाड़ा. ऋगवेद की शांख्यायनी शाखा केपारायण का समापन 29 जून को होगा। इसके साथ ही विश्व में इस शाखा का वाचन करने वाले लोगों की संख्या तीन हो जाएगी। अब तक बांसवाड़ा के पं. इंद्रशंकर झा और हर्षद नागर ही इसके विज्ञ थे। वैदिक भारत न्यास के प्रयासों के बाद शाखा को प्राणवायु देने में सफलता मिली है। बड़ा रामद्वारा में आयोजित प्रेसवार्ता में वैदिक भारत न्यास के डॉ. ज्ञानेंद्र ने बताया कि ऋगवेद की शांख्यायनी शाखा लुप्त होने की कगार पर थी। पांच वर्ष जानकारी मिलने पर बांसवाड़ा के वेदविज्ञों से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि शाखा का अध्ययन करने के लिए तीन से पांच वर्ष का समय लगता है।
तीन वर्ष लगे अध्ययन में
शाखा के अध्ययन के लिए नासिक के अभिजीत दिनकर सवड़े का चयन किया गया। उन्हें तीन वर्ष का समय लगा और इन्हें सिखाने के लिए पं. झा और नागर से शिक्षा दी। अब इनका अध्ययन पूर्ण हो चुका है। परीक्षण के लिए 23 जून से पारायण किया जा रहा है। शाखा के उचित अध्ययन का परीक्षण पं. झा व नागर के अतिरिक्त राजनारायण दवे और डॉ. ज्ञानेंद्र ले रहे हैं।
बड़ा रामद्वारा संत का सहयोग
डॉ. सापकोटा ने बताया कि अभिजीत के अध्ययन व निवास को लेकर बड़ा रामद्वारा संत रामप्रकाश महाराज का पूरा सहयोग मिला, जिससे इस शाखा के अध्ययन का कार्य पूर्ण हो पाया। इसके लिए डॉ. सापकोटा के द्वारा वैदिक भारत न्यास का गठन किया, जिसमें तकरीबन 10 सदस्य हैं। इस शाखा को ऑनलाइन करने का कार्य मोहित भारद्वाज कर रहे हैं।
Published on:
26 Jun 2018 12:24 pm
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