28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Teachers Day Special : नवाचार के छोड़े तीर, बदली शिक्षण की तस्वीर

वागड़ के शिक्षकों ने अपने प्रयास के बूते दिया शिक्षण को नया रूप, ताकि सरकारी स्कूलों में भी बच्चों को मिल सके आधुनिक और बेहतर शिक्षा

3 min read
Google source verification
Teacher's day special, innovation of teachers, banswara, government school, banswara news, banswara hindi news

आशीष बाजपेई.बांसवाड़ा. नवाचार इंसान के स्वभाव में शामिल है और यह काम कोई शिक्षक करे तो उसका लाभ उसका एक शिष्य नहीं बल्कि पीढिय़ां उठाती है, पूरा समाज उठाता है। शिक्षक महज तीन अक्षरों का शब्द है, लेकिन इसका प्रभाव ऐसा है कि इसमें इंसान का दिल-दिमाग, आचार-विचार में आमूल बदलाव लाने की ताकत है।

बच्चे को मायूसी के भंवर जाल से निकालकर उत्साह के समंदर में तैरने लायक बनाने की शक्ति है। यही वजह है कि शिक्षक को पीढ़ी निर्माता कहा जाता है। वो शिक्षक ही है, जिसने अपनी मेहनत और ज्ञान के बूते युवा पीढ़ी को न केवल इंसान और संस्कारवान बनाने का काम किया है बल्कि वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर जैसे अनेक बड़े पदों के लायक बनाकर देश के नवनिर्माण में अपनी भूमिका अदा की है। चाणक्य हो या द्रोणाचार्य सभी ने शिक्षण से सामान्य बालकों को प्रतिभाओं का धनी बनाया जो देश-दुनिया के लिए मिसाल बनकर उभरे। शिक्षक दिवस के मौके पर राजस्थान पत्रिका वागड़ के ऐसे कुछ शिक्षकों को यहां प्रस्तुत कर रहा है, जिन्होंने नवाचारों को अपनाकर अपनी मेहनत और लगन के बूते शिक्षा को नया आयाम देने का जतन किया। कठिन लगने वाले अंग्रेजी को सरल रूप दिया। किताबी ज्ञान से हटकर वीडियो के माध्यम से शिक्षण का नया तरीका इजाद किया। ताकि नौनिहालों को बेहतर शिक्षा पद्धति से जोड़ा जा सके और भविष्य को एक सुनहरे कल में तब्दील किया जा सके।

रंगों से दिया शिक्षा को नया आयाम

राजकीय प्राथमिक विद्यालय धनपुरा के शिक्षक प्रदीप सिंह राठौड़ ने तो बच्चों की पढ़ाई की दुनिया ही बदल दी। बड़े निजी स्कूलों की शिक्षा पद्धति गांवों के बच्चों को उपलब्ध कराने की ललक ऐसी जागी कि स्वयं ही चित्रकारी करने की ठान ली और बारीकियों से रू-ब-रू होकर स्कूल में अध्ययापन कार्य को एक नई दिशा दी। आज स्कूल में बच्चे गणित, अंग्रेजी, भूगोल सहित अन्य विषयों को बड़ी लगन से सीखते हैं। रंगों और चित्रकारी के बूते यह शिक्षण पद्धति बच्चों को बेहद रास आ रही है। इसे लेकर शिक्षक राठौड़ ने बताया कि स्कूल में उन्होंने स्वयं चित्रकारी कर बच्चों को पढ़ाने का कार्य किया है। इससे बच्चे बड़े रुचि लेकर पढ़ते हैं। स्कूल में सांप-सीढ़ी, घड़ी, रंगीन कंकड़ों आदि चीजों के माध्यम से बच्चों को ज्ञान दिया जाता है।







अंग्रेजी को आसान बनाने का जतन


अंग्रेजी सीखने की चाह सभी को होती है। लेकिन इसे सीख पाना कई लोगों को टेढी खीर लगता है। ल् इसे आसाना बनाने के लिए राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय नादिया के शिक्षक नरेश कुमार जोशी ने अनूठी पहल कर डाली। वर्ष 2015 में नियुक्त हुए शिक्षक ने जब परंपरागत पद्धति से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया तो एक वर्ष तक प्रयासरत रहने के बाद भी आशानुरूप परिणाम नहीं मिले। इस पर शिक्षक ने कुछ नया करने का विचार बनाया। इसके बाद शिक्षक जोशी ने बच्चों को अंग्रेजी की वर्णमाला के अक्षरों को काट क्रम में लगाना, इनके माध्यम से अंग्रेजी शब्द बनाना सरीखी कई गतिविधियों के माध्यम से अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया। शिक्षक के इस जतन से बच्चों की रूचि अंग्रेजी के प्रति काफी बढ़ गई और इसे सीखना भी आसान हो गया।

वीडियों के माध्यम से बनाई पढ़ाई आसान

किताबी ज्ञान तो दुनिया का हर एक शिक्षक बच्चों को देता है। लेकिन धाणीपाड़ा स्कूल में कार्यरत शिक्षिका ऊषा पण्ड्या ने बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ अलग हटकर ठानी और वीडियो के माध्यम से बच्चों को क से कबूतर, ख से खरगोश पढ़ाना प्रारंभ किया। उनके इस प्रयास को सरकार से लेकर शिक्षा विभाग ने काफी सराहा। इसके लिए उन्हें स्वतंत्रता दिवास पर सम्मानित भी किया गया। इस नवाचार से सभी बच्चों को लाभांवित करने के लिए क्रिएटिव टीचर ऑफ राजस्थान की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

प्रोजेक्टर के माध्यम से शुरू कराई पढ़ाई

बच्चों के लिए शिक्षा का रुचिकर बनाने के लिए ऐसा ही कुछ नवाचार किया शिक्षक भंवर गर्ग ने। कुछ वर्ष राप्रावि बड़लिया में कार्यरत शिक्षक ने बच्चों की सरकारी स्कूल के प्रति घटती रुचि से आहत हो नवाचार करने और बच्चों का रुझान सरकारी स्कूल की ओर बढ़ाने के लिए अनूठा कदम उठाया। इसके तहत इन्होंने बच्चों को प्रोजेक्टर के माध्यम से पढ़ाना प्रारंभ किया। वीडियो के माध्यम से दी जाने वाली इस शिक्षण व्यवस्था से बच्चों को कठिन विषय भी रुचिकर लगने लगे। इतना ही नहीं शिक्षक के इस प्रयास से गांव के 15 से 20 बच्चों ने निजी स्कूलों को छोड़ सरकारी स्कूल की राह पकड़ी। शिक्षक गर्ग के इस नवाचार के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।