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राजस्थान में बच्चों का सौदा : सास बीमार थी, इसलिए मां ने पैसे लेकर गडरियों के पास रखा गिरवी

बच्चे को इंदौर पुलिस ने आरपीएफ और चाइल्ड हेल्पलाइन के सहयोग से लोक बिरादरी ट्रस्ट अरमान संस्था में पुनर्वासित किया।

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ग्रामीणों को समझाते अधिकारी- फोटो- पत्रिका

जिस उम्र में बच्चों के हाथों में स्लेट और किताब होनी चाहिए, उस उम्र में भेड़ों की बाड़ के पीछे उनका बचपन खो रहा है। दक्षिण राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में आठ साल बाद एक बार फिर बच्चों को गडरियों के पास गिरवी रखने का मामला उजागर हुआ है। दो मासूमों को सिर्फ कुछ रुपयों के बदले पशुपालकों के साथ चरवाहा बनाकर भेज दिया गया था।

मासूम ने लगाई गुहार

इनमें से एक बच्चा, जो बांसवाड़ा जिले के मुंडासेल ग्राम पंचायत का निवासी है, हाल ही में इंदौर के फतेहाबाद थाने पहुंचा और अपनी व्यथा बताई। उसने पुलिस से गुहार लगाई कि उसे घर वापस भेजा जाए। बच्चे की वापसी के बाद जब चाइल्ड लाइन की टीम उसके घर पहुंची, तो मां ने बोली कि मेरी सास बहुत बीमार थी। इलाज के लिए पैसे नहीं थे। इसलिए बच्चे को कुछ पैसों के बदले गड़रियों को सौंप दिया। हमें नहीं पता था कि यह कितना गलत है। अब गलती नहीं होगी। मैं अपने बच्चे को पढ़ाना चहाती हूं। मेरे पास ही रखूंगी।

बच्चे को इंदौर पुलिस ने आरपीएफ और चाइल्ड हेल्पलाइन के सहयोग से लोक बिरादरी ट्रस्ट अरमान संस्था में पुनर्वासित किया। वहां से जिला बाल कल्याण समिति, इंदौर ने संपर्क कर बांसवाड़ा की समिति को बालक की सामाजिक जांच रिपोर्ट तैयार करने को कहा। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017-18 में भी ऐसे कई मामले सामने आए थे, जिसके बाद से चाइल्ड लाइन के प्रयासों के बाद यह रुके।

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भेड़े, भूख और बेबसी : गिरवी हुए बचपन की सच्चाई

जांच में सामने आया कि एक अन्य बच्चा प्रतापगढ़ जिले की पीपलखूंट पंचायत समिति का निवासी है, जो अब भी इंदौर में ही है। दोनों ही बच्चों को भेड़ें चराने के लिए अलग-अलग गांवों में भेजा गया। काम के बदले दो वक्त का अधूरा खाना दिया गया, जबकि बच्चों से दिनभर चरवाही करवाई जाती रही। उन्हें एकमुश्त राशि देकर गिरवी रख लिया गया।

बाल श्रम पर लगी चौपाल, गांववालों को किया जागरूक

बांसवाड़ा जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष दिलीप रोकड़िया के निर्देशन में चाइल्ड लाइन के समन्वयक ने पीड़ित परिवार की काउंसलिंग की। समिति ने यह सुनिश्चित करने के लिए ग्राम पंचायत में चौपाल का आयोजन करवाया, जिसमें सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी और ग्रामीणों ने भाग लिया। सहायक निदेशक, बाल अधिकारिता विभाग हेमंत खटीक ने ग्रामीणों को समझाया कि बच्चों को किसी भी हालत में मजदूरी के लिए नहीं भेजा जाए। सरपंच को निर्देश दिया गया कि गांव में कोई भी बालक भविष्य में श्रमिक न बने।

अब स्कूल जाना चाहता है मासूम

राजकीय संप्रेषण गृह के अधीक्षक नानूलाल रोत ने बताया कि बालक ने बताया वह स्थानीय विद्यालय में पांचवीं कक्षा तक पढ़ा है और अब दोबारा स्कूल जाना चाहता है। चाइल्ड लाइन जिला समन्वयक कमलेश बुनकर ने बताया कि यह कोई अकेला मामला नहीं है, लेकिन पिछले वर्षों में इन घटनाओं पर नियंत्रण पाया गया था। अब जब आठ साल बाद ऐसा मामला फिर सामने आया है, तो सक्रियता बढ़ा दी गई है।

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