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पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया व समर्थकों के खिलाफ दर्ज 19 एफआईआर रद्द नहीं, खारिज कीं 19 याचिकाएं

कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में किसी पर दुर्भावना का आरोप नहीं है। ऐसे में सभी एफआईआर की जांच भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी से कराने की प्रार्थना भी नहीं मानी जा सकती।

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बारां

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Mukesh Gaur

May 01, 2025

कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में किसी पर दुर्भावना का आरोप नहीं है। ऐसे में सभी एफआईआर की जांच भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी से कराने की प्रार्थना भी नहीं मानी जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में किसी पर दुर्भावना का आरोप नहीं है। ऐसे में सभी एफआईआर की जांच भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी से कराने की प्रार्थना भी नहीं मानी जा सकती।

भाया व अन्य के खिलाफ दर्ज 19 मामलों को हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती

जयपुर/बारां. हाईकोर्ट ने विधानसभा चुनाव के बाद पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया और उनके समर्थकों के खिलाफ विभिन्न थानों में दर्ज 19 मामलों में राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में किसी पर दुर्भावना का आरोप नहीं है। ऐसे में सभी एफआईआर की जांच भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी से कराने की प्रार्थना भी नहीं मानी जा सकती।

याचिकाकर्ताओं को किसी विशेषाधिकार का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने अनुसंधान अधिकारियों को निष्पक्ष जांच करने का आदेश दिया, वहीं इन मामलों की जांच में सहयोग के लिए याचिकाकर्ताओं को 10 दिन के भीतर हाजिर होने का निर्देश दिया।न्यायाधीश समीर जैन ने प्रमोद जैन व अन्य की ओर से दायर 19 याचिकाओं को खारिज करते हुए गुरुवार को यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधव मित्रा ने कहा कि विधानसभा चुनाव हारने के बाद प्रमोद जैन भाया व उनके समर्थकों के खिलाफ सत्ताधारी पार्टी के प्रभाव में राजनीतिक द्वेषता से एफआईआर दर्ज कराई गईं। इनमें लगाए गए आरोप बेबुनियाद और कई साल पुराने प्रकरणों से संबंधित हैं।

जांच निष्पक्ष नहीं होने की आशंका जताते हुए सभी मामलों की बारां-झालावाड़ जिले से बाहर पदस्थापित आईपीएस अधिकारी से संयुक्त रूप से निष्पक्ष जांच कराने का आग्रह किया, वहीं सभी एफआईआर रद्द करने की प्रार्थना भी की। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनोज शर्मा ने कहा कि एक ओर एफआईआर रद्द करने की गुहार की है, वहीं इनकी संयुक्त जांच की मांग की है। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अवैध खनन, नगर निगम के फर्जी दस्तावेज, फर्जी पट्टा और वित्तीय अनियमितता सहित विभिन्न आरोप होने के कारण संयुक्त जांच संभव नहीं है। याचिकाकर्ता जांच में सहयोग भी नहीं कर रहे। इसके अलावा किसी आरोपी को यह अधिकार नहीं है कि वह मनचाहे अधिकारी से जांच का आग्रह करे। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।