
बरेली। दीपावली के पश्चात् आने वाली इस एकादशी को देव उठनी या देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। 31 अक्टूबर को इस बार देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन विशेष तौर पर त्रिपुष्कर एवं अमृत योग बन रहा है, जोकि कार्यसिद्धी दाता होता है। अतः विष्णु जी की विशेष कृपा भक्तों को प्राप्त होगी।
बालाजी ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा ने बताया कि चार माह पूर्व चार जुलाई आषाढ़ शुक्ल देव शयनी एकादशी के दिन शयनस्थ हुये थे देवी-देवताओं मुख्यतः भगवान श्री विष्णु का इस एकादशी को जाग्रत होना माना जाता है। विष्णु के शयनकाल के इन चार मासों में विवाह आदि मांगलिक शुभ कार्याें का आयोजन निषेध माना जाता है। हरि के जागने के बाद ही इस एकादशी से सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य शुरू किये जाते हैं। इस बार भी इस दिन विवाह आदि का योग नहीं बन रहा है, परन्तु स्वयं सिद्ध अबूज मुहुर्त है। इस दिन तुलसी पूजन का उत्सव, तुलसी से शालिगराम के विवाह का आयोजन धूम-धाम से मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार जिन दम्पतियों के कन्या नहीं होती है, वह जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्या दान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें।
देव उत्थान एकादशी पर करें तुलसी विवाह
लोक मान्यता परम्परानुसार देव प्रबोधिनी एकादशी में ही तुलसी विवाह किया जाता है, एकादशी व्रत का पारण जिस दिन हो उससे पूर्व दिन अथवा रात्रि में तुलसी विवाह होना चाहिए। इस दिन व्रती स्त्रियां प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक पूर कर भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करती हैं। दिन की तेज धूप में विष्णु जी के चरणों को ढ़क दिया जाता है। रात्रि को विधिवत् पूजन के बाद प्रातःकाल भगवान को शंख, घंटा-घड़ियाल आदि बजाकर जगाया जाता है और पूजा करके कथा सुनाई जाती है। भारतीय संस्कृति में अनेक व्रतोत्सव मनाये जाते हैं। इनमें तुलसी-शालिगराम जी का विवाह एक महत्वपूर्ण आयोजन है, यह विवाह अखण्ड सौभाग्य देने वाला होता है। यह विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी को आयोजित किया जाता है। तुलसी एक पूज्य वृक्ष है, इसका एक-एक पत्र वैष्णवों के लिए द्वादशाक्षर मंत्र (ऊँ नमोः भगवते वासुदेवाय) की भांति प्रभाव करने वाला होता है, वृहत धर्म पुराण के अनुसार हिन्दुओं के धार्मिक कार्य तथा संस्कार बिना तुलसी के अधूरे रहते हैं। कार्तिक मास में तुलसी पूजन महत्वपूर्ण है, भगवान विष्णु ने परमसती तुलसी की महत्ता स्वीकार की थी, तुलसी विवाह सामूहिक रूप से होता है, ऐसे माता पिता जिनके पुत्र अथवा पुत्री के विवाह में विलम्ब हो रहा है उनको श्रद्धापूर्वक तुलसी विवाह सम्पन्न कराना चाहिए, इसका फल तत्काल मिलता है। विशेष रूप से कार्तिक मास में तुलसी विवाह का आयोजन कन्या दान के रूप में करते हैं।
कैसे करें विवाह
इस विवाह में लोग तुलसी जी के पौधे का गमला, गेरू आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख का मण्डप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं, गमले को साड़ी ओढ़ा कर, तुलसी को चूड़ी चढ़ा कर उनका श्रृंगार करते हैं।तत्पश्चात् एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखते हैं तथा भगवान शालिग्राम जी की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी जी की सात परिक्रमा कराकर उसके बाद आरती करने के पश्चात् विवाह उत्सव समाप्त होता है। इस विवाह को महिलाओं के परिपेक्ष्य में अखण्ड सौभाग्यकारी माना जाता है।
तुलसीदल के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें
1. तुलसी पत्र बिना स्नान किये नहीं तोड़ना चाहिए। इससे पूजन कार्य निष्फल हो जाता है।
2. वायु पुराण के अनुसार पूर्णिमा, अमवस्या, द्वादशी, रविवार व संक्रान्ति के दिन दोपहर दोनों संध्या कालों के बीच में तथा रात्रि में तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए, तेल मालिश किये हुये भी तुलसी ग्रहण न करें।
3. जन्म या मृत्यु के अशौच में, अपिवत्र समय में तुलसी पत्र ग्रहण नहीं करना चाहिए। क्योंकि तुलसी श्री हरि के स्वरूप वाली ही हैं।
4. धर्म पुराण के अनुसार तुलसी पत्र को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भी नहीं तोड़ना चाहिए।
5. तुलसीदल कभी दांतों से नहीं चबाना चाहिए।
6. गणेश जी की पूजा में तुलसी पत्र चढ़ाना वर्जित है।
Updated on:
31 Oct 2017 08:15 am
Published on:
31 Oct 2017 08:12 am
बड़ी खबरें
View Allबरेली
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
