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28 साल बाद प्रेम लौटा अपने घर, असम के बीहड़ में आदिवासियों के कब्जे में बीत गई जवानी

-मिट्टी की महक और अपनों का साथ...अब घर जो आ गया हूं -28 साल बाद प्रेम लौटा अपने घर, दिवाली की खुशियां दोगुनी-14 साल का था तब हो गया लापता-असम के बीहड़ में आदिवासियों के कब्जे में बीत गई जवानी

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After 28 years, Prem returned to his home, happiness of Diwali doubled

After 28 years, Prem returned to his home, happiness of Diwali doubled

बाड़मेर. बाड़मेर के 42 साल के प्रेम भार्गव की कहानी (Story of Prem Bhargava) किसी फंतासी जैसी ही है। करीब 28 साल पहले लापता हुआ घर का बेटा फिर परिजन के बीच आ गया।

30 अक्टूबर का दिन परिजन के लिए दिवाली की खुशियां लेकर आया, जब अचानक प्रेम सामने आ खड़ा हुआ। सभी को पहचाना तो घर परिवार झूम उठा।

प्रेम की कहानी उसी की जुबानी

बाड़मेर शहर के शास्त्रीनगर में शनि मंदिर के सामने रहने वाले प्रेम भार्गव बताते हैं कि रिश्तेदार की गाड़ी के साथ जयपुर गया था। रास्ते में टायर बदलने के दौरान हमले में बेहोश हो गया।

करीब 15 दिन बाद होश आया तो जंगल में पाया। आदिवासियों से घिरा था, उनके कब्जे में 8-10 लोग और थे। उनकी भाषा अलग थी। उनके कब्जे में रहने वाला युवक हिंदी जानता था। उसने बताया कि तुम असम के बीहड़ में हो।

कपड़े नहीं, पेड़ के पत्ते पहनते थे

हमें आंखों पर पट्टी बांधकर ले जाया जाता था। खाने को उबले चावल मिलते। पीने को पानी भी पूरा नहीं देते। पूरे दिन चाय की पत्तियां तोडऩे का काम करवाया जाता। कपड़ों की जगह पेड़ के पत्ते पहनते थे।

आग लगी तो भाग निकले

हमने दो बार भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़े गए। कुछ महीनों पहले जंगल में आग लगी तो मैं और गुजरात का एक युवक रात को भाग गए। कुछ लोग और भी भाग रहे थे, आदिवासियों ने उन्हें तीर मार दिए।

हमने हिम्मत नहीं हारी, करीब 3 महीनों तक जंगलों की खाक छानने के बाद सड़क दिखी तो पता चला कि बिहार-नेपाल सीमा पर हैं। यहां पर ट्रक चालक ने मदद करते हुए झांसी पहुंचाया।

वहां मजदूरी की। जहां काम करता था, उस व्यापारी ने बाड़मेर तक पहुंचाने में मदद की और मजदूरी के रुपए भी दिए। यहां आने पर अब सुकून आ गया है, अब जो मेरा घर आ गया है।