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गर्मी की दस्तक से पहले ही मटकियां बनाने में जुटे कुम्भकार

- मोकलसर की मटकियों की पड़ोसी राज्य तक मांग, सरकारी संरक्षण की दरकार
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बाड़मेर

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Dileep Kumar Dave

•

Updated: 13 Feb 2018, 10:07 PM IST

मोकलसर की मटकियां

मोकलसर की मटकियां

मोकलसर.
जल को शीतल करने के लिए प्रसिद्ध मोकलसर की मटकियों के निर्माण में कुुंभकार परिवार जुट गए हैं। इससे उनकी व्यस्तता बढ़ गई है।

मोकलसर की मटकियां जिले, संभाग ही नहीं पड़ोसी प्रदेश गुजरात में भी बिकने जाती है। इसका कारण लम्बे समय तक पानी शीतल रहना है। गर्मी में इनकी मांग अधिक रहने पर कुंभकार माघ व फाल्गुन मास की शुरूआत के साथ ही मटकियां बनाने में जुट जाते हैं। इससे इन दिनों कुंभकारों की व्यस्तता अधिक बढ़ गई है। परिवार के सदस्य काम में उनका हाथ बंटा रहे हैं। आसानी से मिट्टी नहीं मिलने व मटकी पकाने के लिए जलाऊ लकड़ी महंगी बिकने पर कुंभकारों का धीरे-धीरे मटकी उद्योग से मोहभंग हो रहा है। इस पर अब इने-गुने परिवार ही मटकियां बनाने हैं।

सरकारी संरक्षण की दरकार- कुम्भकारों के अनुसार यह हस्तशिल्प कला का ही एक नमूना है। आधुनिक चकाचौंध के बीच मटकियों की मांग वैसे भी कम हो रही है। एेसे में सरकार इसको संरक्षण दें और मिट्टी की उपलब्धता के साथ आर्थिक सहयोग दें तो कई परिवारों का पालन-पोषण हो सकता है।

मेहनत ज्यादा, परिश्रम राशि कम- मिट्टी से खिलौने, मटकियां, मटके आदि बनाना एक कला है। यहां चंद कुंभकारों के पास ही है। इसमें मिट्टी भिगाने से लेकर बर्तन बनते तक इतनी मेहनत लगती है कि कारीगर की हालत खस्ता हो जाती है। बावजूद इसके अधिक सौ-सवा रुपए ही मटकी के मिलते हैं। वहीं होलसेल ले जाने वाले तो साठ रुपए तक ही देते हैं। एेसे में कम दाम और ज्यादा मेहनत के चलते कुम्भाकार समाज की वर्तमान पीढी तो इससे परहेज की कर रही है।
फ्रिज ने बढ़ाई चिंता- मिट्टी की बर्तन का पानी शीतल होने के बावजूद वर्तमान पीढ़ी फ्रिज के शीतल पानी को पीना पसंद करती है। एेसे में कुम्हारों के रोजगार पर संकट पैदा हो गया है।

सरकारी संरक्षण नहीं-
मिट्टी उद्योग को सरकार की ओर से कोई संरक्षण व संर्वद्धन नहीं दिया जा रहा है। दिन व दिन मटकी निर्माण महंगा हो रहा है। वहीं, कमाई कम हो रही है। इससे कुंभकारों का इससे मोहभंग हो रहा है। सरकार उद्योग को संरक्षण दें। - मांगीलाल प्रजापत, मायलावास