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विलायती बबूल बना हर जिले में संकटकारी, करना पड़ेगा जलाकर कोयला

बारिश, पानी की उपलब्धता और पौधरोपण की जागरूकता में हजारों किस्म के पौधे पनपाए जा सकते है, लेकिन घातक विलायती बबूल 500 तरह की प्रजातियों को तो अब तक खत्म कर चुका है।

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पर्यावरण, अन्य वनस्पति,पक्षियों और किसानों के सिरदर्द बन रहे विलायती बबूल (कीकर) को हटाने के लिए राज्य सरकार ने जिलों को करीब 10-10 लाख रुपए दिए है लेकिन ये हींग की गरज भी नहीं साधेंगे। राज्य के वन क्षेत्र एवं पंचायत की भूमि में करीब 15 फीसदी से भी अधिक फैल चुके विलायती बबूल को अब कोयला बनाकर बेचने की बड़ी मुहिम जरूरी हो गई है। गैर जरूरी हो रहे इस कंटीली झाड़ी को रेगिस्तानी राजस्थान को हरा-भरा करने के लिए तीन दशक पहले हैलीकाप्टर से बीज डालकर उगाया गया था लेकिन अब यह राज्य में अन्य वनस्पति को ही नहीं उगने दे रहा है। बारिश, पानी की उपलब्धता और पौधरोपण की जागरूकता में हजारों किस्म के पौधे पनपाए जा सकते है, लेकिन यह घातक विलायती बबूल 500 तरह की प्रजातियों को तो अब तक खत्म कर चुका है।
विलायती बबूल कीकर (जूलीफोरा) को तीन दशक पहले रेगिस्तान में हरियाली, फैलते रेगिस्तान को रोकने और रेत को जड़ से मजबूत करने के वरदान के रूप में माना गया। इसके बीज पूरे राजस्थान में छिडक़ा दिए गए,लेकिन इसके भविष्य के घातक परिणामों का नहीं सोचा गया। हुआ यह कि अब विलायती बबूल इतना फैल गया हैै कि प्रदेश का संभवतया कोई जिला नहीं है जहां जंगल से खेत, क्यार, गांव और चारागाह तक पहुंच गया है। तेजी से फैल रहे विलायती बबूल को रोकने के लिए सरकार के प्रयास नाकाफी हैै।
10 लाख दिए इससे क्या होगा

राज्य सरकार ने जिलों को वनक्षेत्र में विलायती बबूल हटाने को इस साल करीब 10-10 लाख रुपए दिए है। जानकार बताते है कि इसको यों समझेंं कि बाड़मेर में 11000 हैक्टेयर वनक्षेत्र में बबूल है। एक हैक्टेयर के लिए 60 हजार रुपए का व्यय है। अब यह तो बीस हैक्टेयर में ही पूरा हो जाएगा। जड़ से इस बबूूल को खत्म करना है तो तीन साल तक लगातार एक ही जगह पर यह राशि खर्च करनी होगी। यह तो केवल वनक्षेत्र का गणित है, पंचायत की भूमि में 24 प्रतिशत के करीब पेड़ है,इसमें 18 प्रतिशत विलायती बबूल है। लिहाजा यह बजट तो यूं ही रेत में धूल डालने जैसा होगा।

कैसे हों समाधान
- पर्यावरणविद डा. गोपालकृष्ण व्यास बताते है कि पंचायत की भूमि में बबूूल के पेड़ को नीलाम करने की योजना सरकार लाएं। इसकी लकड़ी ईंधन और कोयले के लिए उपयोगी है। जड़ सहित नष्ट करने के टेण्डर हों। इससे पंचायतों को आय होगी और ये पेड़ हर पंचायत में खत्म होगा।
- दूसरा, राज्य सरकार ने इस बार चारागाह विकास पर जोर दिया है। बबूल के पेड़ की बहुलता वाले कुछ इलाकों को चयनित कर यहां पहले नीलामी कर बबूल हटाया जाए, फिर चारागाह का विकास हों

500 प्रजातियां खत्म कर चुका है, चेत जाओ
कृषि वैज्ञानिक डा. प्रदीप पगारिया बताते है कि बबूल अपने इर्दगिर्द की वनस्पति को निगल रहा है। करीब 500 प्रजातियों को खत्म कर दिया है। रेगिस्तान में जाळ, खेजड़ी, नीम, गूगल, ग्वारपाठा, पीपली, सरेस, कैर को लगातार कम कर रहा है। पहाड़ों में औषधीय पादप अश्वगंध सहित कई पौधों की जगह बबूल ही बबूूल हो गया है।