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हवा से भी कमा रही सरकारें, हम जाकर किसको पुकारें ? दुबई कब?

बाड़मेर की तो हवा भी अब कीमती हो गई है। जैसलमेर-बाड़मेर दोनों जिले अभी 4000 मेगावाट पवन ऊर्जा पैदा कर रहे है और बाड़मेर में यह गति आने वाले तीन साल में जैसलमेर जितनी होगी तो 10 हजार मेगावाट का आंकड़ा पार होगा। यहां पर भी यही हाल है कि जिन गांवों में पवन ऊर्जा की चक्कियां लगी है और लाखों करोड़ों का राजस्व है, उन गांवों के हिस्से क्या मिला? आलम तो यह हैै कि ये गांव खुद ही बिजली को तरस रहे है।

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हवा से भी कमा रही सरकारें, हम जाकर किसको पुकारें ? दुबई कब?

हवा से भी कमा रही सरकारें, हम जाकर किसको पुकारें ? दुबई कब?

बाड़मेर पत्रिका. जैसलमेर में पवन ऊर्जा कामयाब हुई तो पवन चक्कियां आगे बढ़ते हुए शिव में पहुंची है और अभी 120 पवन चक्क्यिों से 36 करोड़ का राजस्व मिल रहा है। शिव क्षेत्र में ऊंचे-ऊंचे लगे ये पंखे देखकर लगता है कि यहां विकास द्रुतगति से हो रहा हैै लेकिन जिन गांवों में ये पवन चक्कियां है वे अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे है। गांवों के विकास का छोडि़ए मूलभूत सुुविधाएं तक नहीं है। यह जाल आगे फैलता जा रहा है।
यों बिछा है जाल
वर्ष 2012 में कोटड़ा,रामपुरा,मेहरान की ढाणी में 16 पवन चक्कियां लगाई थी। वर्ष 2015 में शिव,गूंगा,अंबावाड़ी, हुक्मसिंह की ढाणी क्षेत्र में 20 पवन चक्कियां लगाई गई। वर्ष 2022 में हड़वा व राजडाल क्षेत्र में 50 व भिंयाड़, धारवी क्षेत्र में 35-36 पवन चक्कियां लगाई । मौसम अनुकूल होने से एक पवन चक्की प्रतिदिन औसतन 8200 रूपये की बिजली उत्पन्न होती है। ऐसे में एक पवन चक्की सालान तीस लाख की बिजली उत्पन्न करती है। शिव क्षेत्र में लगी 120 पवन चक्कियां 36 करोड़ का राजस्व दे रही हैं।
गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव -उपखंड क्षेत्र के ग्राम पंचायत कोटड़ा,राणेजी की बस्ती,हड़वा,राजडाल,धारवी, भियाड़ के गांवों में पवन चक्कियां लगी हुई है। इन चक्कियों से निजी कंपनियों को प्रतिदिन लाखों का राजस्व हो रहा है। फिर भी इन गांवों में मूलभूत सुविधाएं का अभाव है। गांवों में पेयजल की गंभीर समस्या है। सड़क क्षतिग्रस्त हैं। मुख्य मार्गों पर कचरे के ढेर लगे पड़े हैं। निजी कम्पनियां इन गांवों की सुध नहीं ले रही है।
परेशानियां क्षेत्र के हिस्से
- पवन चक्कियां लगने के बाद में पक्षियों की संख्या कम हुई है
- वायु प्रदूषण का नुुकसान लगातार हो रहा है
सरकार और कंपनी-ग्राम पंचायत कहीं नहीं
सरकार और कंपनियों के बीच करार हो रहा है। कंपनियां कृषि, गैर कृषि की जमीन प्राप्त कर रही है। कंपनियों को इसके लिए सरकार दरों में रियायतें भी दे रही है। प्रोजेक्ट का एक हिस्सा ऋण के रूप में मिलता है। सरकार और कंपनी दोनों ही आपस में कमा रही है लेकिन दुबई बनाने के सपने दिखाने वाली ग्राम पंचायतों के हिस्से कुछ नहीं है। ये केवल पंखों को देखकर ही प्रसन्न होते नजर आते है।


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