
Increased tender perioud 5 times Giral Power Plant, no buyer find
बाड़मेर.बाड़मेर में लिग्नाइट कोयले पर आधारित सरकारी उपक्रम की गिरल पावर प्लांट की दोनों इकाइयां सफेद हाथी साबित हो रही हैं। सरकार ने 2000 करोड़ के प्लांट को बेचने के लिए डेढ़ साल में प्लांट की टेंडर अवधि पांच बार बढ़ा दी लेकिन सरकार को कोई खरीददार नहीं मिल रहा है।
मंत्रिमंडल स्तर पर मामला अटका
लिग्राइट आधारित गिरल पावर प्लांट थुंबली में वर्ष 2007 में 125 मेगावाट की पहली यूनिट स्थापित हुई। उसके बाद 2009 में दूसरी यूनिट स्थापित की गई। पर इनमें प्रयुक्त कोयले में सल्फर की मात्रा अधिक होने से दोनों ही इकाइयां पूरी तरह फेल हो गईं। सरकार ने पहली इकाई को जुलाई 14 व दूसरी को जनवरी 16 में बंद कर दिया। जबकि 125-125 मेगवाट की दोनों इकाइयां कार्य करतीं तो करीब 30 प्रतिशत उत्पादन पर भी 50 लाख रुपए प्रतिदिन सरकार को फायदा होना था, लेकिन यह इकाइयां पिछले तीन साल से घाटे में हैं। इकाइयां बंद होने के बाद नवंबर 2016 मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार ने प्लांट को बेचने का निर्णय किया। लेकिन कई बार निविदाएं निकालने के बावजूद कोई खरीददार नहीं मिल रहा है।
क्यों हुई ऐसी स्थिति
गिरल की इकाइयों के लिए मिल रहे कोयले में सल्फर की मात्रा अधिक होने से दोनों ही इकाइयां फेल हो चुकी हैं। सल्फर ने इन इकाइयों को चॉक कर दिया। इसकी रिपोर्ट लगातार सरकार तक पहुंची, लेकिन सरकार ने इसका कोई वैकल्पिक या स्थायी समाधान नहीं किया।
- सरकार स्तर का मामला
गिरल की दोनों इकाइयां बंद हैं। अभी कुछ भी नहीं कह सकते। बंद के बाद घाटे में ही है। 60 के करीब स्टाफ कार्यरत है। यह मामला अब सरकार के पास है। - राकेश वर्मा, मुख्य अभियंता, गिरल पावर प्लांट
गिरल प्लांट एक नजर -
पहली इकाई जुलाई 2014 में बंद
- दूसरी इकाई जनवरी - 2016 में बंद
- 3 साल से बंद इकाइयों का घाटा 1200 करोड़ पार - दो साल में 6 बार बढ़ाई टेंडर अवधि - 2000 करोड़ का प्लांट, प्रतिदिन 25 लाख की चपत - बंद इकाइयों में लगा है 60 का स्टाफ, 40 लाख रुपए वेतन-भत्ता - देखरेख के लिए 100 करोड़ की मांग
Published on:
26 May 2018 08:35 am
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