
गेर दल नृत्य की देते हैं मनमोहक प्रस्तुतियां
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रामलाल चौधरी
समदड़ी पत्रिका.
विधानसभा में भूत होने की चर्चा सुर्खियां बटोर रही है वहीं जिले के लाखेटा गांव में किवदंती अनुसार एक भूत को भगाने की खुशी आज भी यहां मेले के रूप में मनाई जाती है और लोग यहां भोग चढ़ाते है। अम्बों का बाड़ा में संत संतोष भारती की समाधि पर भरने वाले इस मेले को लेकर यही कहानी गढ़ी हुई है। गेर मेला रविवार को भरेगा जिसमें गेर की रम्मक-झम्मक देखते ही बनेगी।
संत का तप
किवंदती के अनुसार करीब 525 साल पूर्व यहां एक गांव आबाद था। तालाब के पास संतोष भारती महाराज की कुटिश्स थी। 500 वर्ष पूर्व जोधपुर के तत्कालीन महाराजा सूरसिंह की सेना ने जोधपुर से जालोर प्रस्थान के दौरान इसी कुटिया व तालाब के पास पानी को देखकर विश्राम के लिए अपना पड़ाव डाला तो संतोष भारती ने इसका विरोध किया। सेना नहीं मानी तो क्रोधित महाराज के श्राप से तालाब का पानी अचानक सूख गया। यह देख सेना में खलबली मच गई। सेना ने इसकी जानकारी महाराजा सूरसिंह को दी । महाराज के नाम से बुरड़ गांव में 1 हजार बीघा भूमि डोली ने नाम दान की और क्षमा मांगी।
भूत के नाम से तालाब व मेला
संत का तप सुनकर अम्बों का बाड़ा गांव के लोगों ने कहा कि यह गांव पूरा आबाद था लेकिन यहां लाखा भूत का आतंक होने से गांव उजड़ गया। बताया जाता है कि महाराज ने इससे मुक्ति दिलाई लेकिन मुक्ति से पूर्व लाखा ने वचन लिया कि संतोषभारती समाधि लेंगे तो उसका भी स्थान यहां बनेगा जहां पर प्रसाद चढ़ेगा।
1965 के बाद भरने लगा मेला
वर्ष 1965 से इस मेले की शुरुआत छोटे रूप में हुई। कोटड़ी के सरपंच तेजसिंह ने 1965 में चैत्र वदी तृतीया के दिन सभी ग्रामवासियों को एकत्रित कर मेला आयोजन की शुरुआत की। वर्ष 1982 में कोटड़ी निवासी कानसिंह कोटड़ी प्रधान बने, तब मेले ने ख्याति प्राप्त की। ग्राम पंचायत कोटड़ी की ओर से मेला आयोजित किया जाता है।
प्रसिद्ध है गेर नृत्य
होली के तीसरे दिन होने वाले इस मेले में आस-पास के दर्जनों गांवों से हजारों लोग भाग लेते हैं। मेले में गेर नृत्य आकर्षण का केन्द्र रहता है। चंग की थाप पर बजते फाल्गुनी गीत, ढोल की ढमकार, थाली की टंकार व घुंघरूओं की रुणझुण पर युवा समूह में डांडिया गेर नृत्य करते हैं। आंगी गेर नृत्य लोगों को रोमांचित करता है। महिलाएं लूर नृत्य करती है। मेला कमेटी गेर दलों को पुरस्कृत करती है।
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सरकारी मदद की जरूरत
ग्राम पंचायत मेले का आयोजन करती है लेकिन पंचायत के साधन सीमित है। सरकारी मदद जरूरी है। सरकार मेले को गोद लेकर लोक संस्कृति के संवर्धन व सरंक्षण के प्रयास करें। इसके लिए विधानसभा में मांग भी रखी थी।
- कानसिंह कोटड़ी, अध्यक्ष मेला कमेटी व पूर्व विधायक
मिले सरकारी संरक्षण-
आज भी इस धार्मिक स्थान की आस्था कायम है। वर्ष 2001 से लाखेटा मेला ग्राम पंचायत के तत्वावधान में हो रहा है। मेलों को सरकारी सरंक्षण मिलना चाहिए।
हीरालाल भील, सरपंच कोटड़ी
भोग लगता है
लाखा भूत के नाम से ही तालाब का नाम लाखेटा पड़ा। यहां पर मेला लगने के साथ ही दोनों स्थलों पर प्रसाद चढ़ाई जाती है।
- लादुपुरी गोस्वामी, पुजारी
Published on:
10 Mar 2018 05:57 pm

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