
leads the soul with ticket at Haridwar
बाड़मेर.रोडवेज और रेलवे को अकसर यह शिकायत रहती है कि लोग बिना टिकट के सफर करते है लेकिन सीमावर्ती जिले में तो जिंदा आदमी ही नहीं उसकी अस्थियां भी जब हरिद्वार जाती है तो अलग से टिकट लिया जाता है। बिना टिकट के आत्मा हरिद्वार तक नहीं पहुंचेगी इस मान्यता के चलते एेसा किया जाता है।
कुछ मान्यताएं एेसी है जो अजीब तो है लेकिन लोगों के जेहन में एेसे उतर चुकी है कि उसकी पालना करना लोग धर्म मानते है। एेसी ही एक मान्यता है मृत्यु के बाद अस्थियों का हरिद्वार ले जाकर विसर्जित करने की ताकि आत्मा को पूर्ण शांति मिले। सीमावर्ती जिले में अधिकांश समाज तो इसे बारह दिन में ही पूर्ण कर लेते है,लेकिन इसमें रोचक तथ्य जुड़ा हुआ है। दरअसल अस्थियों की रवानगी तक यह मानते है कि आत्मा साथ है। इसलिए अस्थियांे के साथ जो भी परिवार का व्यक्ति रवाना होता है वह आमंत्रित करता है कि साथ में चले। इसके बाद रोडवेज या रेलवे में बकायदा आत्मा के लिए भी टिकट लिया जाता है। इस टिकट को मृतक के नाम से ही लिया जाता है,चाहे सीट को खाली र खना पड़े। रेल व बस में बैठते वक्त यह कहा जाता है कि यहां बैठें और हरिद्वार चलें। इसके बाद पूरे रास्ते में इस बात का ख्याल रखते है कि अब खाना खाएंगे, चाय पीएंगे, कहीं स्टेशन पर उतरे है तो संबंधित मृतक को नाम या रिश्ते के साथ बुलाना कि आप भी यहां उतरिए और अब वापिस चढि़ए। हरिद्वार में अस्थि विसर्जन तक यह प्रक्रिया रहती है।
कई समाज में सालों से पड़ी है अस्थियां- कई समाज एेसे भी है जहां सालों से मृतकों की अस्थियां घर में ही है। इन अस्थियों की सुबह-शाम पूजा होती है। सहूलियत होने पर इनका विसर्जन किया जाएगा। दस से बारह साल से घर में रखी इन अस्थियों का विसर्जन नहीं हुआ है।
यह मान्यता है
एेसी लोक मान्यता है। इसको कई लोग अपनाते है। यह उनकी खुद की आस्था से जुड़ा हुआ मामला है। परिवार के सदस्य के प्रति श्रद्धा अनुरूप एेसा करते है।- पंडित सुनिल जोशी
Published on:
04 Apr 2018 12:09 pm
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