
अपने घर के बाहर मौजूद पदमसिंह सोढ़ा।
बाड़मेर। पदमसिंह छाछरो…1971 के युद्ध में जब भारतीय सेना छाछरो पहुंची तो तत्कालीन रेलमंत्री लक्ष्मणसिंह सोढ़ा उनके छोटे भाई पदमसिंह और अन्य ने भारत का साथ दिया। भारतीय तिरंगा खुद पदमसिंह ने अपनी हवेली पर लहरा दिया। पाकिस्तान ने लक्ष्मणसिंह और पदमसिंह पर जासूसी के लिए दो लाख का ईनाम घोषित कर दिया।
शिमला समझौते बाद जब भारतीय सेना छाछरो से लौटी तो ये दोनों भाई परिवार सहित भारत के चौहटन आ गए। यहां से बावड़ी कला में आकर बस गए। लक्ष्मणसिंह चौहटन के प्रधान भी रहे। उनके साथ में राजपूत, मेघवाल व अन्य परिवार भी यहां बसे। पदमसिंह के मन में एक ही टीस थी कि वे छाछरो हवेली के मालिक थे, वह पाकिस्तान में छूट गई।
अब वे खुद को पदमसिंह छाछरो कहते तो हैं, लेकिन उनका गांव यह नहीं है। राजस्थान सरकार ने 54 साल बाद बावड़ीकला से एक नया राजस्व गांव छाछरो घोषित कर दिया है। 77 साल के पदमसिंह की आंखों में अब चमक है। वे कहते हैं अब मैं फिर से पदमसिंह छाछरो हो गया हूं। अब पाकिस्तान नहीं, भारत हूं।
ये परिवार अब तक बावड़ी कला में ही थे, लेकिन फिर इन्होंने अपना अलग राजस्व गांव बनाना तय किया। इसका नाम भी इन्होंने छाछरो प्रस्तावित किया, जिसको राज्य सरकार की ओर से स्वीकार कर लिया गया। करीब 100 हैक्टेयर क्षेत्रफल में इस गांव में 362 की जनसंख्या है। पुराने गांव से एक किमी की दूरी पर ही यह नया गांव बसा है।
1971 के युद्ध में पश्चिम की बाखासर की सीमा से भारत ने कूच किया और सात दिन में ही ब्रिगेडियर भवानी सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान के भीतर 100 किमी पहुंचकर छाछरो फतेह कर लिया। छाछरो पाकिस्तान का बड़ा कस्बा था। करीब आठ माह बाद शिमला समझौता हुआ तो भारत ने इस जमीन को छोड़ दिया। इससे पहले आठ महीने भारतीय सेना का यहां कब्जा रहा। बाड़मेर कलक्टर व एसपी के अधीन छाछरो थाना था।
हमारे परिवार ने 1971 में भारत का साथ दिया था। पाकिस्तान के मुख्य कस्बे छाछरो के हम तात्कालीन जागीरदार थे। हवेली भी थी। यहां आकर बसे तो मान सम्मान में कमी नहीं रही। यहां आकर चौहटन के प्रधान रहे। परिवार के सदस्य पंच-सरपंच व अन्य पदों पर रहे। राजस्व गांव अलग से बन रहा था तो मन में लगा कि छाछरो नाम दे तो ठीक रहेगा। बस, यह प्रस्ताव भेजा। सरकार ने मान लिया, हम ताउम्र शुक्रगुजार रहेंगे।
-पदमसिंह सोढ़ा, राजस्व गांव, छाछरो
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Published on:
19 Mar 2025 02:46 pm
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