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पादरिया में घर-घर बिछी है खाट, 40 से अधिक अपाहिज, आखिर ऐसा क्यों? जानिए पूरी खबर

ह्यूमन स्टोरी :-अज्ञात बीमारी से ग्रस्त है लोग, पहले जकड़ते हैं पांव, फिर चली जाती है आंखों की रोशनी  
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Barmer padriya news

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भवानीसिंह राठौड़@बाड़मेर. सरहदी क्षेत्र के पादरिया गांव के लिए विकलांगता व अंधता अभिशाप बन गई है। तीन सौ की आबादी के गांव में 40 के करीब लोगों के पांव जकड़ गए। इसके बाद आंखों की रोशनी चली गई। घर-घर खाट बिछी है और ये लोग लाचारगी की जिंदगी जी रहे हंै। इलाज के नाम पर कुछ दवाइयां ली। कई दिन भोपों के चक्कर में भी फंसे। पुरानी पीढ़ी ही नहीं दस-दस साल के बच्चों को भी पांवों के दर्द, पांव जकडऩा और आंखों की रोशनी जाने का दर्द है। चिकित्सा महकमा इस सबसे अनजान है। ग्रामीण कहते है कि उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि इस बीमारी का उपचार करवा सके और मदद मिल नहीं रही।

मां-बेटे की ङ्क्षजदगी बेहाल
ग्रामीण मंशाराम बताते है उनका बेटा कमलेश दस साल का है। जन्म के कुछ समय बाद ही वह विकलांग हो गया। उसकी आंखों की रोशनी भी चली गई। इसके कुछ दिनों बाद पत्नी हुरमी के भी पांव जकड़ गए। दोनों मां बेटों को अज्ञात बीमारी ने घेर लिया। उपचार करवाया लेकिन दोनों ही ठीक नहीं है, घर में खाट पकड़े हुए हैं। अब आर्थिक स्थिति कमजोर होने से बाहर उपचार करवाने की हैसियत नहीं है।

पहले पांव जवाब दे गए फिर आंखें
गांव के 65 वर्ष के खिदू खां दस साल से चलने में लाचार है। पहले पांव खराब हो गए बाद में आंखों की रोशनी चली गई है। खिदू कहता है कि हालते गोडे और देखते नैणे..दो ही सुख जीवन में माने गए हैं औैर दोनों ही छीन गए हंै। अब तो जीने की भी इच्छा खत्म हो रही है।

पता नहीं कौनसा रोग है
ग्रामीण बजरंगाराम बताते है कि उसकी 22 साल की बेटी जानकी अपाहिज और मानसिक विकलांग है। इस उम्र में बेटी की यह स्थिति पिता की नींद उड़ा चुकी है। वह कहता है कि पता नहीं कौनसा रोग लगा है मेरी बेटी की जिंदगी खराब कर गया है।

मां-बेटा व बहू तीनों अपाहिज
चूनाराम, उसकी मां मंजू व पत्नी मारीयत तीनों ही लाचार है। दस साल से खाट पकड़े हुए है। परिवार की सार संभाल कर रहा रमेश कहता है कि परिवार में आठ लोग हैं। तीन खाट पकड़े हुए हंै। पहले जालौर मजदूरी को जाता था लेकिन अब इनकी देखभाल भी जरूरी है। परिवार पर बीमारी कहर बनकर टूटी है।

गांव में लगे शिविर
एक गांव में चालीस से अधिक लोग अपाहिज हों और चिकित्सा विभाग की नजर में नहीं आए यह चिंतनीय है। इस गांव में शिविर लगाकर इस बीमारी से जूझ रहे लोगों की जांच की जाए। आने वाली पीढ़ी को इससे बचाने का प्रयास होना चाहिए।- कल्याणसिंह इन्द्रोई, सामाजिक कार्यकर्ता

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