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थार में 10 फीट के पौधे लगाने का ज्वार, वन विभाग ने इतने लाख पौधे लगाने का रखा लक्ष्य

थार के रेगिस्तान में पानी की पीड़ा और पेड़ की छांव को लोग सालों तक तरसे हैं वहां नहरी पानी आने के बाद लोगों का पौधरोपण को लेकर जज्बा उमडऩे लगा है।

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Planting 10 feet plant in Thar

थार में 10 फीट के पौधे लगाने का ज्वार, वन विभाग ने इतने लाख पौधे लगाने का रखा लक्ष्य

बाड़मेर. थार के रेगिस्तान में पानी की पीड़ा और पेड़ की छांव को लोग सालों तक तरसे हैं वहां नहरी पानी आने के बाद लोगों का पौधरोपण को लेकर जज्बा उमडऩे लगा है। आम आदमी हरियाली को लेकर इतना उत्साहित है कि इस साल तो थार में 10-10 फीट के पौधे लगाने का ज्वार है। लोग अपने लगाए पौधे को जल्दी पेड़ बनाने के जुनून में इतने लंबे पौधे ऊंचे दामों में खरीद रहे हैं। वन विभाग ने इस बार थार में पांच लाख पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया है लेकिन लोग इससे दो गुने पौधे बाजार की नर्सरी, जोधपुर और गुजरात से मंगवाकर लगा रहे हैं।

लंबे पौधे का ज्वार- बाजार में आधा फीट से लेकर 12 फीट तक के पौधे उपलब्ध हैं। सामान्यत आधा फीट का पौधा लगाया जाता है लेकिन पिछले दो सालों से लोगों की रुचि लंबे और बड़े पौधे लगाने में हो गई है। पौधे जल्दी पेड़ बनें इसके लिए बाजार की नर्सरी में दस से बारह फीट के पौधे उपलब्ध हैं। इनकी कीमत 250 रुपए प्रति पौधा है जिसको लोग खरीदकर लगा रहे हैं।

प्रतिदिन बिक रहे हैं हजारों पौधे

हालांकि अभी बारिश का दौर पूरे जिले में प्रारंभ नहीं हुआ है लेकिन नर्सरी से पौधे ले जाने का क्रम शुरू हो गया है। सरकारी नर्सरी से एक हजार पौधे बिके हैं,गैर सरकारी के अलग हैं। वनविभाग ने इस बार पांच लाख पौधों का लक्ष्य निर्धारित किया है।

यह है पौधों के दाम ( निजी नर्सरी)
लंबाई - कीमत

2 फीट -20 रुपए
4 फीट -50 रुपए

5 फीट - 80 रुपए
7 फीट - 100 रुपए

10 से 12 फीट - 250 रुपए

सरकारी नर्सरी

वन विभाग ने आम आदमी के लिए पांच रुपए और सरकारी विभागों के लिए एक रुपया पौधे की कीमत तय की है।
ये पौधे उपलब्ध-

नीम- 10,000
करंज- 2,000

खेजडी-2,000
रोहिड़ा- 2,000

शीशम- 1,500
सुरेल- 1,000

जाल- 500
सरेस- 300

गुलमोहर- 200

लंबे पौधे जल्दी पनपेंगे- लंबे पौधे जल्दी पनपेंगे। हालांकि इनकी जीवित रहने की दर 70 प्रतिशत है और छोटे पौधे की 95 प्रतिशत लेकिन देखरेख तरीके से हो तो ये नर्सरी में दो साल की उम्र पार कर आते हैं तो पेड़ शीघ्र बनेंगे ।- डा. प्रदीप पगारिया, कृषि वैज्ञानिक