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Rajasthan: पिता ने मजदूरी कर पढ़ाया, झोंपड़ी में पढ़कर बेटा बना शिक्षक, रिजल्ट बताने के लिए भी नहीं था फोन में बैलेंस

Success Story: आर्थिक तंगी के बीच झोंपड़ी में बैठकर पढ़ाई करने वाले धर्मेंद्र ने तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा में सफलता हासिल करके युवाओं के लिए मिसाल पेश की है।

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Success Story

झोंपड़ी के आगे खड़ा धर्मेंद्र का फोटो: पत्रिका

Motivational Story Of Govt Teacher: सपनों को उड़ान देने के लिए न तो आलीशान कोचिंग की जरूरत होती है और न ही आधुनिक सुविधाओं की। यदि हौसले बुलंद हों तो रेतीले धोरे पर बनी एक साधारण झोंपड़ी भी सफलता का रास्ता तैयार कर सकती है। बालोतरा जिले के कालेवा गांव निवासी धर्मेंद्र जाणी ने अपने संघर्ष और आत्मविश्वास से यह साबित कर दिखाया है। तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा में 196.33 अंक प्राप्त कर राज्य में 1380वीं रैंक हासिल करने वाले धर्मेंद्र आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं।

मजदूरी के साथ जगा शिक्षक बनने का सपना

मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले धर्मेंद्र का सफर आसान नहीं था। कोरोना काल में परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई तो उन्होंने रिफाइनरी में मजदूरी की। बाद में अहमदाबाद की एक कपड़ा फैक्ट्री में नौकरी कर परिवार का सहारा बने। इसी दौरान वर्ष 2021 की शिक्षक भर्ती में उनके ताऊ के पुत्र गुमनाराम जाणी के चयन ने उनके मन में भी शिक्षक बनने का सपना जगा दिया।

57 साल के पिता वालाराम जाणी ने मजदूरी कर बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाया। परिवार ने आर्थिक संकट झेला और समाज के ताने भी सुने, लेकिन धर्मेंद्र ने हर कठिनाई को अपनी ताकत में बदल दिया। मोटी फीस और बाहर रहकर तैयारी करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे, इसलिए उन्होंने सेल्फ स्टडी को ही अपना हथियार बनाया और उसी के दम पर सफलता हासिल की।

संघर्ष की पाठशाला बनी धोरे की झोंपड़ी

धर्मेंद्र ने वर्ष 2022 में अपने पिता वालाराम जाणी से एक अवसर मांगा और शिक्षक भर्ती की तैयारी शुरू कर दी। आर्थिक तंगी के कारण बड़े कोचिंग संस्थानों तक पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने घर के पास धोरे पर घास-फूस और लकड़ियों से एक छोटी सी झोंपड़ी बनाई और उसे ही अपनी पाठशाला बना लिया। तपती गर्मी, सर्द हवाओं और सीमित संसाधनों के बीच उसी झोंपड़ी में बैठकर उन्होंने अपने सपनों को आकार दिया।

धर्मेंद्र के संघर्ष का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई महीनों तक उनके पास मोबाइल फोन तक नहीं था। परिणाम आने के दिन पिता को अपनी सफलता की सूचना देने के लिए फोन में बैलेंस तक नहीं था। लेकिन अभावों के बीच भी उन्होंने उम्मीद की लौ बुझने नहीं दी और लगातार मेहनत करते रहे। धर्मेंद्र अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता के त्याग और विशेष रूप से गुमनाराम जाणी से मिली प्रेरणा तथा अध्यापक खुमाराम गोदारा के मार्गदर्शन को देते हैं।