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मिच्छामी दुक्कडम कहकर की क्षमा याचना

संवत्सरी प्रतिक्रमण कर की पापों की आलोचना आत्म चिंतन, आत्म निरीक्षण, आत्म मंथन व आत्म शोधन का पर्व संवत्सरी: विराग मुनि

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Shwetambar Jain Samaj celebrated Samvatsari festival

Shwetambar Jain Samaj celebrated Samvatsari festival

बाड़मेर. शहर के आराधना भवन में चल रहे पर्युषण पर्व के तहत सोमवार को श्वेताम्बर जैन समाज ने संवत्सरी पर्व मनाया। इस दौरान उपस्थित जैन सुमदाय ने जाने अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए एक दूसरे को मिच्छामी दुक्कडम कह कर क्षमा याचना की। इस दौरान विनयकुशल मुनि की निश्रा में खरतरगच्छ संघ चातुर्मास कमेटी की ओर से चल रहे प्रवचन कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए विरागमुनि ने मूल बारसा सूत्र का वाचन किया।

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उन्होंने कहा कि बादल बनकर नहीं, आसमान बनकर जिए, भक्त बनकर नहीं भगवान बनकर जिएं, जिंदगी कितनी लंबी जिएं कोई मतलब नहीं एक दिन भी जिएं मगर इंसान बनकर जिएं। अब तक जो गलतिया हुई उनको आगे न दोहराए। मुनि ने कहा कि संवत्सरी शुद्ध रूप से आध्यात्मिक पर्व है।

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यह आत्म चिंतन आत्म निरीक्षण, आत्म मंथन व आत्म शोधन का पर्व है। जैन धर्म की त्याग प्रधान संस्कृति में संवत्सरी पर्व का अपना अपूर्व एवं विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। यह एकमात्र आत्मशुद्धि का पर्व है। यह पर्व ही नहीं महापर्व है। संवत्सरी अंतरात्मा की आराधना का पर्व है।

आत्मशोधन का पर्व है। सोना तपकर कुन्दन बनता है इंसान तपकर भगवान बनता है। उन्होने कहा कि जैन शास्त्रों में क्षमा को वीरों का आभूषण कहा गया है। महावीर का उपासन बनने पर सबसे पहले अपने मन में क्षमा का गुण विकसित करें। संवत्सरी हमें आत्म आलोचना करना सिखाती है।

दूसरों की निंदा व दोष नहीं करना चाहिए। मित्रों के बजाए शत्रुओं को क्षमा करना संवत्सरी सिखाता है। क्षमापना पर रिश्तेदारों, मित्रों के घर जाने के जाए उन लोगों के घर जाए जिनके यहां हमारी बोलचाल नहीं है। जिन्हें हम पंसद नहीं करते है। यही सच्ची क्षमापना होगी।