
Sinking of Sardar Sarovar Dam
बड़वानी. सरदार सरोवर बांध की डूब में आए गांवों सैकड़ों विस्थापितों के सामने नया संकट आ खड़ा हुआ है। सरकार की बात मानकर गुजरात में विस्थापित हुए इन डूब प्रभावितों की स्थिति दरबदर जैसी हो गई है। गुजरात के कई जिलों में जो जमीन इन विस्थापितों को दी वो बंजर निकली। साथ ही स्थानीय लोगों ने भी इन विस्थापितों का विरोध किया, जिसके बाद ये वापस मूल गांव लौट आए। अब सरकार इन डूब प्रभावितों को गुजरात में विस्थापित बता रही है। कागजों पर हुए विस्थापन के चलते न तो इन डूब प्रभावितों को पुनर्वास नीति का लाभ मिल रहा है, न सिर छुपाने के लिए आश्रय।
सरदार सरोवर बांध के विस्थापन के शुरुआती दौर में एनवीडीए द्वारा कई विस्थापितों को गुजरात में अच्छी जमीन देने की बात कही गई थी। एनवीडीए और सरकार पर विश्वास कर वर्ष 1991 से 2000 के बीच तीन हजार से ज्यादा डूब प्रभावितों ने गुजरात में जमीन लेना कबूल किया था। गुजरात पहुंचने के बाद इन डूब प्रभावितों ने अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया। जो जमीन खेती के लिए दी गई थी, वो बंजर और उजाड़ थी। जिस पर खेती करना संभव नहीं था। साथ ही यहां सिंचाई के लिए पानी के साधन भी उपलब्ध नहीं थे। गुजरात गए अधिकतर परिवारों ने गुजरात में विस्थापन को ठुकराकर वापस मप्र में ही विस्थापन की मांग की थी। न तो इन विस्थापितों की मांग पूरी हुई, न वापस आए विस्थापितों को सरकार ने दोबारा डूब प्रभावित माना।
54 में से 53 परिवार वापस लौटे मूलगांव
जिले के डूब गांव नंदगांव, जामदा से 54 विस्थापितों ने गुजरात जाना कबूल किया था। वहां की परिस्थितियों को देखने के बाद 54 में से 53 परिवार मूल गांवों में वापस लौट आए। इसके बाद से ये परिवार मूलगांव में ही अपनी डूब की जमीन पर खेती कर रहे थे। नंदगांव निवासी भागीरथ छगन, कमल पिता बाबूलाल, दयाराम जुवानसिंह ने बताया कि कागजों पर तो हमारा विस्थापन हो चुका हैं और हमें गुजरात में जमीन देना बता दिया है। हकीकत में अब न तो हमारे पास गुजरात में जमीन है, न पुनर्वास में। हमारी जमीन, घर सब डूब गए हैं और एनवीडीए हमें डूब प्रभावित नहीं बता रहा है। जबकि गुजरात जाकर हम तुरंत वापस लौट आए थे। आज भी हमारे सभी दस्तावेज मूलगांव के ही बने हुए है।
कोई रिश्तेदार के यहां तो कोई किराये के मकान में
नंदगांव निवासी बाबू पिता बंशी, सीताराम गुलाब ने बताया कि एनवीडीए हमें गुजरात का विस्थापन बताकर डूब से बाहर कर रही है। न तो घर-प्लाट का लाभ मिला, न ही मकान बनाने के लिए 5.80 लाख का। पुनर्वास नीति का कोई लाभ हमें नहीं दिया जा रहा है। सिर्फ कागजों पर ही हमारे पास गुजरात में जमीन है। ये सभी विस्थापित घर से बेघर हो चुके है। कोई अपने रिश्तेदार के यहां तो केाई किराये के मकान में रह रहा है। नंदगांव, जामदा, पेंड्रा की करीब 300 एकड़ कृषि भूमि इन डूब प्रभावितों की डूब चुकी है या टापू बन चुकी है। अब खेत नहीं होने से इनकी रोजी रोटी पर भी संकट आ गया है।
Published on:
08 Oct 2019 10:30 am
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