
Navratri - कच्छावा वंश की माता का मंदिर वटवृक्ष की छत्रछाया में
जमवारामगढ़। रामगढ़ बांध के पास वन्यजीव अभयारण्य की खजूर के पेड़ों से लकदक सुरम्य घाटी में बाणगंगा नदी के तट पर जयपुर-आंधी-जमवारामगढ़-अलवर स्टेट हाईवे पर ऐतिहासिक जमवाय माता का मंदिर स्थित है। माताजी का मंदिर वटवृक्ष की छत्रछाया में रहता है। जमवाय माता जयपुर राजघराने के शासक कच्छावा वंश की कुलदेवी हैं।
जमवाय माता जन जन की आस्था का केन्द्र हंै। मां जगदम्बा जमवाय के दर्शन करने देशभर से श्रद्धालु हर समय आते हैं। चैत्र नवरात्रा व शारदीय नवरात्रो में प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। चैत्र नवरात्रा अष्टमी को बड़ा मेला भरता है। माता के यहां सैकड़ों की संख्या में पदयात्राएं आती है। यात्रियों की संख्या अधिक होने से मंदिर प्रशासन को मुख्यद्वार के साथ संकटकालीन द्वार का निर्माण करवाना पड़ा है। माता जी मंदिर परिसर में शिव जी व भैरव जी स्थापित है। माता जी पूजा अर्चना से पहले भैरव जी की पूजा की जाती है। यहां हर समय अखंड ज्योत जलती है। जमवाय माता मंदिर की देखरेख जयपुर राजघराना का ट्रस्ट करता है।
ये है मंदिर का इतिहास
जमवाय माता के पुजारी भगवती प्रसाद वशिष्ठ बताते हैं कि राजा के बड़े बेटे कुश के नाम पर कच्छावा वंश पड़ा है। कच्छावा वंश के सोढ़ देव के बेटे दूल्हेराय दौसा के राजा थे। राजा का विवाह मारवाड़ में तय हुआ। दूल्हेराय बारात लेकर मारवाड़ मांच वर्तमान जमवारामगढ़ होकर बग्घी व शाही लवाजमे के साथ जा रहे थे।
मीणा शासकों का शासन था
मांच मेें सीरा गोत्र के मीणा शासकों का शासन था। मांच के राजा राव नाथू ने दूल्हेराय की बारात को रोक लिया व युद्ध के लिए ललकारा। फिर बारात लौटकर आई तथा मांच की सेना से युद्ध किया। युद्ध के बाद दुल्हन, दासी व पंडित बचे। दूल्हेराय की पत्नी ने वहीं सती होने के लिए पंडितजी से काष्ठ जमा करने को कहां। ज्योहि पंडित ने बलि देने के लिए तलवार निकाली कच्छावा वंश की कुलदेवी बुढवाय माता वटवृक्ष के नीचे गाय के साथ प्रकट हईं।
Published on:
19 Oct 2020 10:55 pm
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