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कुंवारों की जोडिय़ां बनाती है चीथवाड़ी की ‘श्रवण माता

मंदिर कई चमत्कारी शक्तियों व कृ पा के लिए प्रसिद्ध है, यहां श्रद्धालु चैत्र व शारदीय नवरात्र पर धोक लगाकर मनोवांछित फ ल प्राप्त करते हैं

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कुंवारों की जोडिय़ां बनाती है चीथवाड़ी की 'श्रवण माता

कुंवारों की जोडिय़ां बनाती है चीथवाड़ी की 'श्रवण माता

चीथवाड़ी। चौमू-चंदवाजी स्टेट हाइवे पर चीथवाड़ी में अरावली पर्वतमाला के शिखर पर बना प्राचीन श्रवण माता का मंदिर शक्तिपीठ के रूप में स्थापित है। मंदिर कई चमत्कारी शक्तियों व कृ पा के लिए प्रसिद्ध है। यहां श्रद्धालु चैत्र व शारदीय नवरात्र पर धोक लगाकर मनोवांछित फ ल प्राप्त करते हैं।
सेवानिवृत्त व्याख्याता बद्री नारायण डागर ने बताया कि संवत् 1132 में हिसार से आए डागर गोत्र के जाट ने चीथवड़ी की पहाड़ी पर गुमटी बनाकर शक्तिपीठ के रूप में सरुण्ड माता के मंदिर की स्थापना की थी। कालांतर में भाषा अपभ्रंश के चलते सरुण्ड माता को श्रवण माता कहने लगे। माताजी का मूल मंदिर कोटपूतली के पास सरूंड गांव में है।

ये है किवदंती
किंवदंती है कि माता के प्रताप से ही चीथवाड़ी में कुछ श्रद्धालु एक पत्थर बैलगाड़ी में रखकर लाए थे। बैलगाड़ी चीथवाड़ी के रास्ते से गुजर रही थी कि चीथवाड़ी पहाड़ी पर बैलगाड़ी स्वत: ही रुक गई। इस पर श्रद्धालुओं ने गुमटी बनाकर सरुण्ड माता के नाम का पत्थर वहां रखकर पूजना शुरू कर दिया। तब से ही श्रवण माता का मंदिर चीथवाड़ी समेत आसपास के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन गया। बुजुर्ग लोगों की मानें तो श्रवण माता को जोडिय़ां बनाने वाली देवी भी कहते हैं।

यहां आकर मनौती मांगते
वर्तमान में भी श्रवण माता के जिन युवक-युवतियों की शादी नहीं होती है। वे यहां आकर मनौती मांगते हैं। पूजा व व्रत करने पर कुंवारों की गृहस्थी बस जाती है। वैशाख शुक्ल पंचमी 2015 में ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। तब से इस तिथि को माता का पाटोत्सव मनाया जाता है। जीर्णोद्धार के बाद यहां मंदिर में पत्थर की जगह माता के वैष्णो स्वरुप की मूर्ति रखवाकर गगन चुंबी गुंबद व ध्वज लगाया। गांव के युवाओं ने श्रवण माता चेरिटेबल ट्रस्ट बनाया, जो वर्तमान में मंदिर विकास को लेकर कार्य कर रहा है। यहां चैत्र व शारदीय नवरात्रों में भी मेले का आयोजन होता है।