
बेमेतरा/साजा . 'कबीर खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैरÓ यह शांति व सद्भाव का संदेश साजा ब्लॉक के ग्राम मुसवाडीह में स्थित देश के छठवें कबीर शांति स्तंभ में दिया गया है। कबीरपंथियों के लिए यह क्षेत्र आस्था का राष्ट्रीय प्रतीक बन चुका है। हर साल फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यहां पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें छत्तीसगढ़ सहित देशभर के कबीरपंथी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। लोग इस दिन दूर-दूर से दीवान साहेब के समाधि स्थल पर माथा टेकने आते हैं।
कबीरपंथियों का राज्य में दूसरा तीर्थ है मुसवाडीह
छत्तीसगढ़ में कबीरपंथियों के तीर्थों में दामाखेड़ा के बाद मुसवाडीह का दूसरा स्थान है। ग्राम मुसवाडीह में संत मनिहार दीवान की समाधि पर होने वाले वार्षिक मेले में इस साल संरक्षक व कबीरपंथ धर्मनगर दामाखेड़ा के आचार्य प्रकाशमुनि नाम साहेब का यहां दूसरी बार आगमन हो रहा है, जिनके द्वारा चौका आरती कराया जाएगा। इस गांव में प्रकाशमुनि नाम साहेब का सन 1999 में आगमन हुआ है। उनके पूर्व उनके पिताजी सतलोक वासी गृंधमुनी नाम साहेब का भी आगमन हो चुका है। वहीं विगत दो साल से 2016 व 2017 में पंथ के छोटे साहेब गुरू गोसाई डॉ. भानुप्रताप का आगमन हुआ।
8 एकड़ जमीन पर लगता है भव्य मेला
बेमेतरा जिले के ब्लाक मुख्यालय साजा से महज 2 किमी की दूर 800 की आबादी वाला साहू बाहुल्य ग्राम पंचायत मुसवाडीह है। जो आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इस गांव में लगने वाले कबीरपंथियों के विशाल मेले की वजह से इसकी ख्याति देशभर में फैली हुई है। यहां पर हर साल संत समागम, चौका आरती व मेला का आयोजन होते चला आ रहा है। मेला स्थल लगभग 8 एकड़ भू-भाग पर फैला हुआ है। मेले में व्यापार करने छोटे-बड़े व्यापारी एक दो दिन पहले अपना स्थान सुरक्षित करने पहुंचने लग जाते हैं।
देवारीभाट के निवासी थे संत मनिहार दीवान
प्राप्त जानकारी के अनुसार संत मनिहार दीवान साहेब मुलत: मुसवाडीह के निवासी नही थे, बल्कि वे खैरागढ़ के समीप ग्राम देवारीभाट के निवासी बताए जाते हैं। वर्तमान में ग्राम मुसवाडीह व आसपास क्षेत्र में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसने दीवान साहेब को देखा हो। इस गांव में संत मनिहार दीवान साहेब की समाधि का निर्माण ग्रामीणों के बुर्जुगों ने कराया था। पुरानी परंपरा अनुसार दीवान साहेब के मठ में हर साल कबीर पंथ तथा अन्य वर्गों के लोग जिनकी आस्था यहां से जुड़ी है, चौका-आरती करते हैं। पहले यहां छोटे रुप में मेला लगता था परन्तु समय की बदलती तस्वीर ने इसे वृहद रुप दे दिया और आज भव्य रूप में संतों का समागम, सात्विक चौका आरती व मेला लगता है।
बिसरुदास व फूलवा बाई ने कराया था समाधि का निर्माण
संत दीवान की समाधि का निर्माण सर्वप्रथम मिट्टी व पत्थर से बिसरूदास व फूलवा बाई ने कराया था। उसके बाद गांव के बुधराम साहू के द्वारा समाधि का जीर्णोद्धार कराते हुए सीमेंट से बनवाया गया। वर्तमान में समाधि को समिति के द्वारा टाईल्स से बनवाया गया है। साथ ही समाधि स्थल को आकर्षक बनाने के उद्देश्य से एक कक्ष का निर्माण कर सुसज्जित किया जा चुका है। मेला स्थल में सुविधा के नाम पर केवल एक हैंडपंप था, लेकिन अब यहां पर समिति का बोरपंप है। सांस्कृतिक मंच बनाया गया है। सीसी रोड का निर्माण कराया गया है। साथ ही एक सामुदायिक भवन का निर्माण कराया जा चुका है।
आयोजन समिति का गठन
ग्राम मुसवाडीह के संत समागम, चौका आरती व मेला की बढ़ती आस्था व भीड़ को देखते हुए गांव के बुर्जुगों व युवाओं ने सुव्यवस्थित संचालन के लिए समिति का गठन किया। जिसके अन्तर्गत सर्वप्रथम संचालन का कार्यभार ग्राम मनियारी के मानिकपुरी समाज को सौंपा गया। जिनके द्वारा 2 साल तक संचालन किया गया। इसके बाद ग्राम हरदास के मानिकपुरी समाज को द्वितीय क्रम का संचालन करने का अवसर मिला। इनका भी कार्यकाल 2 साल का रहा। इसके बाद तीसरा संचालन ठंडार के मानिकपुरी समाज ने किया। यह समिति 3 साल संचालनकर्ता रही। इसके बाद व्यवहारिक विसंगतियों के कारण संचालन को बंद कर आयोजन सामूहिक रूप से ग्रामीणों की देख रेख में होने लगा। मेले में भीड़ को देखते हुए ग्रामीणों ने मार्च 1989 में पुन: बैठक कर मेला उत्सव का संचालन पंथ के मानने वालों की समिति बनाकर उनको सौंपा। जिसमें प्रमुख रूप से तातु दास मंहत ग्राम भरदा, स्वीकृत दास महंत मुसवाडीह, अटल दास दीवान मुसवाडीह के संरक्षण में गांव के वरिष्ठ नागरिक ध्रुवराम को संचालन समिति का प्रथम अध्यक्ष चुना गया। वहीं टहल राम साहू मुसवाडीह को कोषाध्यक्ष, परसु राम साहू मुसवाडीह को सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई।
Published on:
18 Feb 2018 07:25 am
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