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भरतपुर: जिस कक्षा में पढ़ रहे थे बच्चे, अचानक भराभराकर गिरी छत, झालावाड़ हादसा होते-होते बचा

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा जिंदगी बचाना जरूरी हो गया है। यदि टीचर ने चंद सेकेंड पहले देखा नहीं होता तो, भरतपुर में भी झालावाड़ जैसा हादसा हो जाता।

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bharatpur school roof collapsed

छत गिरने के दौरान की तस्वीर (फोटो-पत्रिका)

भरतपुर। जिले के नगला भगत गांव में शनिवार को एक सरकारी स्कूल में बड़ा हादसा टल गया। राजकीय उच्च प्राथमिक महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल में कक्षा के दौरान अचानक छत का हिस्सा भरभराकर नीचे गिर गया। घटना के वक्त कक्षा में पढ़ाई चल रही थी। एक शिक्षक ने खतरा भांपते हुए बच्चों को तुरंत बाहर निकाल लिया, जिससे सभी छात्र सुरक्षित बच गए। कुछ ही सेकेंड में कक्षा धूल के गुबार में तब्दील हो गई। यदि समय रहते बच्चों को बाहर नहीं निकाला जाता, तो यहां भी झालावाड़ जैसा हादसा हो सकता था।

घटना के बाद सामने आया कि यह महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि जर्जर स्कूल भवनों को लेकर प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। सूत्रों के अनुसार, हादसे से एक दिन पहले भी स्कूल भवन का एक हिस्सा गिरा था, इसके बावजूद स्कूल का संचालन जारी रखा गया। सवाल यह है कि जब खतरे के संकेत स्पष्ट थे, तब भी बच्चों को उसी भवन में क्यों बैठाया गया। स्कूल में कुल 28 बच्चों का नामांकन है और एक प्रधानाध्यापक सहित चार शिक्षक कार्यरत हैं।

इंजीनियर की जगह टीचर जांच रहे भवन

सरकार द्वारा स्कूल भवनों की सेहत जांचने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर डालना भी सवालों के घेरे में है। शिक्षक न तो इंजीनियर हैं और न ही भवन विशेषज्ञ, इसके बावजूद उनसे भवन की स्थिति की रिपोर्ट मंगवाई जाती है। इसका नतीजा यह है कि जर्जर भवनों में पढ़ाई जारी रहती है और बच्चों की जान जोखिम में बनी रहती है। यदि हादसे के वक्त बच्चे भीतर होते, तो बड़ा जनहानि का मामला सामने आ सकता था।

जांच के बावजूद गिरी छत

नगला भगत स्कूल में पिछले वर्ष एक नया कक्षा कक्ष भी बनाया गया था। इसके लिए जेडी, सीबीईओ, डीईओ, समसा के अधिकारी और एईएन-जेईएन की टीम ने निरीक्षण किया था। जब पूरी इमारत कमजोर थी, तो नए कमरे के निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई, यह बड़ा प्रश्न है। साथ ही, हर माह होने वाले निरीक्षणों में अधिकारी आखिर क्या देखते हैं। इमारत की हालत या केवल औपचारिकताएं।

जर्जर स्कूलों की सूची में नहीं था

झालावाड़ हादसे के बाद समसा ने जिले के जर्जर स्कूलों की सूची जारी की थी, लेकिन नगला भगत स्कूल का नाम उसमें शामिल नहीं था। जुलाई में 13 विद्यालयों को जर्जर घोषित किया गया था। इसके बावजूद यह भवन सूची से कैसे बाहर रहा, इसे गंभीर चूक माना जा रहा है।

विभाग पर गंभीर सवाल

झालावाड़ हादसे के बाद शिक्षा मंत्री ने जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए 200 करोड़ रुपये जारी करने की घोषणा की थी। भरतपुर को भी इसका हिस्सा मिला होगा, लेकिन नगला भगत जैसे स्कूल तक यह राशि क्यों नहीं पहुंची, इस पर अब सवाल उठ रहे हैं। विभागीय लापरवाही और निरीक्षण व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।