सरकार ने स्कूल में खेलों को बढ़ावा देने की मंशा से शारीरिक शिक्षक नियुक्त कर रखे हैं, लेकिन उन्हें किताब नहीं मिल रही है।
भरतपुर। खेलों की हितैषी होने का दावा करने वाली राजस्थान सरकार ही खेलों का ‘खेला’ करती नजर आ रही है। वजह, पिछले करीब एक दशक से सरकार स्कूलों में मुफ्त भेजने वाली खेल की किताब नहीं भेज रही है। सीबीएसई में तो खेल विषय को ऐच्छिक विषय के रूप में शामिल कर लिया है, लेकिन प्रदेश स्तर पर शिक्षा में खेल विषय का जिक्र तक नहीं है। यही वजह है कि स्कूली शिक्षा में खेलों का धीरे-धीरे खात्मा होता जा रहा है।
राजस्थान के स्कूलों में 10वीं बोर्ड के बाद विद्यार्थियों को विषय चुनने का विकल्प मिलता है। इसमें वह विज्ञान, गणित के साथ अन्य विषय चुन सकते हैं, लेकिन इसमें खेल विषय को शामिल नहीं किया है। यही वजह है कि खेलों के प्रति बच्चों की रुचि कम हो रही है। आलम यह है कि बोर्ड तक की शिक्षा में खेलों को कोई महत्व नहीं है।
जानकारों का कहना है कि यदि इसे अनिवार्य शिक्षा के रूप में शामिल कर किया जाए तो सरकारी स्कूलों से भी खेलों में प्रतिभाएं बहुत आगे जा सकती हैं। अभी न तो इसका कोई पेपर हो रहा है और न ही अंक मिल रहे हैं। यही वजह है कि विद्यार्थी इसमें कतई रुचि नहीं ले रहे हैं।
पूर्व में कक्षा 6 से 10 तक खेल संबंधी निशुल्क पुस्तकें सरकार की ओर से उपलब्ध कराई जाती थीं, जो अब बंद कर दी हैं। ऐसे में स्कूलों में लगे शारीरिक शिक्षकों को कागजों में कालांश तो दिए जा रहे हैं, लेकिन वह खेल गतिविधियां कराने की बजाय बच्चों को नैतिक शिक्षा का ज्ञान देते नजर आ रहे हैं।
सरकार ने निशुल्क पुस्तकें स्कूलों में भेजना बंद कर दिया है। उधर, विभाग का दावा है कि यह किताबें ऑनलाइन मौजूद हैं। किताबें नहीं आने के कारण शारीरिक शिक्षक न तो क्लास ले पा रहे हैं और न ही बच्चों को मैदान तक ले जा रहे हैं। यही वजह है कि बच्चे ग्राउंड से दूर हो रहे हैं। ऑनलाइन किताब की तरह बच्चे भी ऑनलाइन गेमों में ही उलझे नजर आ रहे हैं। शारीरिक शिक्षकों का कहना है कि अभिभावकों का जोर बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने का है। ऐसे में वह पढ़ाई की होड़ में लग गए हैं। बच्चे मैदानों तक नहीं पहुंच रहे हैं।
प्रदेश भर के स्कूलों में 11वीं और 12वीं कक्षाओं में खेल का सब्जेक्ट नहीं है। ऐसे में खेल प्रतिभाएं नहीं निकल पा रही हैं। इसकी मांग शारीरिक शिक्षक लगातार कर रहे हैं। खेल का विषय नहीं होने के कारण शारीरिक शिक्षकों के पद भी लगातार खत्म हो रहे हैं। अब महज 700 से 800 संख्या वाले विद्यार्थियों के स्कूलों में ही शारीरिक शिक्षक लगाए जा रहे हैं।
सूत्रों ने बताया कि सरकार ने स्कूल में खेलों को बढ़ावा देने की मंशा से शारीरिक शिक्षक नियुक्त कर रखे हैं, लेकिन उन्हें किताब नहीं मिल रही है। खुद के ज्ञान और मिलने वाले कालांश के लिए वह अपने स्तर पर खेल से जुड़ी किताब खरीद रहे हैं। खास बात यह है कि स्कूलों में एसयूपीडब्लयू, नैतिक शिक्षा एवं कला शिक्षा आदि भी चलती हैं, लेकिन इनके लिए स्पेशल शिक्षक नहीं हैं। खेल के लिए स्पेशल शिखक होने के बाद भी किताब नहीं दी जा रहीं। शारीरिक शिक्षकों का कहना है कि खेल संबंधी विषय के अंक मार्कशीट में शामिल किए जाएं तो बच्चों का रुझान बढ़ेगा।
पहले सरकार के स्तर पर किताबों को खरीदकर स्कूलों तक भेजा जाता था, लेकिन वह आजकल नहीं आ रही हैं। स्कूल प्रधानाचार्यों के पास स्कूल फेसेलिटी ग्रांट होता है, उससे वह किताब खरीद सकते हैं। कभी-कभी लाइब्रेरी ग्रांट भी मिलती है।
रामखिलाड़ी बैरवा, संयुक्त निदेशक स्कूल शिक्षा, भरतपुर