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शहीद के परिवार की सीख…आज भी संयुक्त रूप से रहता है परिवार

-शहादत को बीते 23 साल, लेकिन आज भी आंखों में बसी है पिता की छवि-गांव अजान के कारगिल शहीद वीरेंद्र सिंह का कहानी...

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शहीद के परिवार की सीख...आज भी संयुक्त रूप से रहता है परिवार

शहीद के परिवार की सीख...आज भी संयुक्त रूप से रहता है परिवार

भरतपुर. 1999 में करगिल युद्ध में शहीद हुए वीरेंदर सिंह अपने पीछे उस समय पत्नी गायत्री देवी और डेढ़ वर्षीय पुत्री ज्योति और तीन वर्षीय पुत्र चंद्रभान सिंह को छोड़ गए थे। पति की शहादत के बाद वीरांगना गायत्री देवी शहीद पति की अर्थी को कंधा देते हुए शमशान तक पहुंची थी, वह प्रदेश की ऐसी पहली वीरांगना थी, जिन्होंने शहीद पति को कंधा दिया था।
आज 26 जुलाई को करगिल युद्ध को 23 साल पूरे होने जा रहे हैं और शहीद वीरेंदर सिंह के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं। दोनों बच्चों को अपने पिता की शहादत पर गर्व है। हालांकि जिस पिता के साथ बचपन बिताना चाहते थे उसकी कमी तो उन्हें हमेशा खलती है, लेकिन परिवार के सदस्यों ने इतना साथ और प्यार दिया कि उन्हें पिता की ज्यादा कमी का अहसास नहीं हुआ। शहीद वीरेंदर सिंह राजस्थान के भरतपुर के गांव अजान निवासी थे, जो कि 11 राज राइफल यूनिट में थे। 1999 में पाकिस्तान के साथ हुए करगिल युद्ध के दौरान वीरेंदर सिंह शहीद हो गए थे। उस समय उनके दोनों मासूम बच्चे अपने पिता की शहादत से अनभिज्ञ थे, लेकिन पति के शहीद होने के बाद बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी पत्नी गायत्री देवी पर आ गई थी। शहीद वीरेंदर का पुत्र चंद्रभान अब बड़ा हो चुका है जो कि कलक्ट्रेट में नौकरी कर रहा है। वहीं शहीद की पुत्री ज्योति भी बीएससी करने के बाद अब एसटीसी कर रही है। ज्योति अध्यापक बनना चाहती है। आज भले ही 23 वर्ष गुजर चुके है और बच्चे अब बड़े हो चुके हो लेकिन फिर भी दोनों बच्चों की आंखों में पिता की याद और उनकी कमी जरूर खलती है। दोनों बच्चों ने बताया कि जब उनके पिता शहीद हुए तब वे बेहद छोटे थे और तब उनको कुछ नहीं पता था लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते गए तो पिता की शहादत के बारे में पता चला और पिता की याद आने लगी, लेकिन आज उनको अपने पिता पर गर्व होता है। इसके अलावा गांव साबौरा निवासी शहीद मनसुख 31 दिसंबर 1998 को कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे।

बड़ी मिसाल...आज भी संयुक्त रूप से रहता है शहीद का परिवार

जानकर आश्चर्य होगा, लेकिन आज उन परिवारों के लिए मिसाल से कम नहीं है, जो कि छोटी-छोटी सी बात पर परिवार को तोड़ देते हैं। अलग-अलग रहने लग जाते हैं। शहीद वीरेंदर के भतीजे बृजेश सिंह ने बताया कि उनके पिता भी शहीद चाचा वीरेंदर सिंह के साथ ही थे। पिता लेफ्टिनेंट से सेवानिवृत हुए हैं। आज भी हमारा पूरा परिवार एक ही जगह रहता है। खाना भी एक ही जगह बनता है।

परेशानी...पेट्रोल पंप चलता ही नहीं, परिवार परेशान

शहीद के भतीजे बृजेश सिंह ने बताया कि शहीद कोटे से उन्हें एक पेट्रोल पंप भी मिला, इससे परिवार का जीवन यापन होता है। हालांकि उत्तरप्रदेश की सीमा पर स्थित होने के कारण वह पेट्रोल पंप ज्यादा नहीं चलता है। क्योंकि उत्तरप्रदेश में डीजल-पेट्रोल की रेट राजस्थान की तुलना कम होने के कारण राजस्थान के पेट्रोल पंप ज्यादा नहीं चलते हैं। इस परेशानी को लेकर कई बार पंप संचालकों की ओर से राज्य सरकार को अवगत भी कराया जा चुका है, लेकिन आज तक सरकार ने कोई सुनवाई नहीं की है।