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पांचना बांध पर पेच: पक्षियों के ‘स्वर्ग’ केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान पर मंडराया विवाद का खतरा, जानिए पूरा मामला

Panchana Dam Water Dispute: दुनियाभर के प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकाना माना जाने वाला केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान पानी के संकट की आशंका के बीच चिंता में है।
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भरतपुर

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Santosh Trivedi

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Updated: 24 Jun 2026, 3:29 PM IST

केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान

केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान. Photo- Patrika

Panchana Dam News: भरतपुर। विश्व धरोहर और पक्षियों के स्वर्ग के रूप में पहचान रखने वाला केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान (घना) पानी के संकट की आशंका के बीच चिंता में है। हजारों किमी की उड़ान भरकर साइबेरिया, मध्य एशिया, यूरोप और देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पक्षियों का यह आश्रय स्थल करौली के पांचना बांध के पानी पर निर्भर है। यही पानी गंभीर नदी के रास्ते घना तक पहुंचता है और यहां के वेटलैंड को जीवन देता है, लेकिन कमांड और कैचमेंट एरिया के किसानों के बीच बढ़ता विवाद परिदों की दुनिया के लिए खतरा बनता नजर आ रहा है।

पांचना को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका ने केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के सचिव, करौली जिला कलक्टर और मुख्य अभियंता सहित अन्य अधिकारियों से पूछा है कि आखिर पांचना बांध का पानी गंभीर नदी में क्यों नहीं छोड़ा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल नदी या किसानों का मुद्दा नहीं है, बल्कि विश्व धरोहर घोषित केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान के अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। करीब 29 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान विश्व के सबसे महत्वपूर्ण वेटलैंड क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां 375 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं।

सर्दियों में हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं। इन पक्षियों के भोजन, प्रजनन और सुरक्षित आवास के लिए पर्याप्त जलभराव अत्यंत आवश्यक है। उद्यान को रामसर साइट और यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा भी प्राप्त है। यदि वेटलैंड का स्वरूप लगातार प्रभावित होता है तो भविष्य में इसकी अंतरराष्ट्रीय मान्यता पर भी प्रश्न चिह्न लग सकता है।

वन विभाग लगातार जता रहा चिंता

वर्ष 2023 में तत्कालीन उप वन संरक्षक (वन्यजीव) नाहर सिंह सिनसिनवार ने जल संसाधन विभाग को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को लगभग 550 एमसीएफटी पानी की आवश्यकता है, जबकि वर्ष 2022 में मात्र 315.81 एमसीएफटी पानी ही उपलब्ध हो सका था। अब वर्तमान डीएफओ ने पानी की मांग पत्र लिखकर उठाई है।

हाल ही में उप वन संरक्षक (वन्यजीव) चेतन कुमार बी.वी. ने संभागीय आयुक्त को पत्र लिखा है। इसमें कहा है कि वर्ष 2003 में पांचना बांध की क्षमता बढ़ने के बाद गंभीर नदी का पानी अजान बांध तक पहुंचना लगभग बंद हो गया, जिससे उद्यान में जल संकट गहरा गया। पर्याप्त पानी मिलने से प्रवासी पक्षियों और पर्यटकों की संख्या बढ़ती है, जबकि जलाभाव से उद्यान की छवि, पर्यटन और क्षेत्रीय विकास प्रभावित होता है।

माह जून-जुलाई में स्थानीय पक्षियों का प्रजनन तथा माह अक्टूबर-नवम्बर से विदेशी पक्षियों का आगमन होता है। पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं होने के कारण ये पक्षी उद्यान से अन्यत्र पलायन कर जाते हैं। इस कारण इस विश्व विरासत श्रेणी के उद्यान की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा भरतपुर में आने वाले पर्यटकों की संख्या भी प्रभावित होती है।

गंभीर नदी सूखी तो घना भी प्रभावित

गंभीर नदी कभी पूर्वी राजस्थान की प्रमुख नदियों में गिनी जाती थी। करौली से निकलकर यह भरतपुर तक पहुंचती है और केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत मानी जाती है, लेकिन पिछले कई वर्षों से नदी का अधिकांश हिस्सा रेत के मैदान में तब्दील हो चुका है।

गंभीर नदी जल बचाओ समिति का कहना है कि पांचना बांध बनने के बाद नदी में नियमित जल प्रवाह बाधित हो गया। नतीजतन करीब 288 किलोमीटर लंबी नदी का बड़ा हिस्सा सूख गया। इससे न केवल नदी किनारे बसे 360 गांव प्रभावित हुए बल्कि घना का प्राकृतिक जल चक्र भी कमजोर पड़ गया।

अब फंस गया विवाद

पांचना बांध का पानी फिलहाल किसानों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। एक ओर कमांड क्षेत्र के किसान नहरों में पानी छोड़ने की मांग कर रहे हैं तो दूसरी ओर बांध के आसपास के 39 गांवों के किसान पहले अपने क्षेत्र को पानी देने की बात कह रहे हैं। यह विवाद दो दशकों से चला आ रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इस पूरे विवाद के बीच केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान का मुद्दा पीछे छूट गया है। यदि गंभीर नदी में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित नहीं किया तो इसका सीधा असर घना के वेटलैंड पर पड़ेगा।

याचिकाकर्ता का कहना है

पिछले करीब 20-25 साल से नदी में पानी नहीं आ रहा है। यह चिंता का विषय है। इसके लिए हाइकोर्ट में याचिका लगाई है। अब सरकार के मंत्री ने आश्वस्त किया है कि उनकी मांग को सरकार तक पहुंचाया जाएगा। पानी नहीं आने का असर नदी के आसपास के गांवों के साथ घना पर भी पड़ रहा है।

  • कुलदीप गुर्जर मूड़िया, याचिकाकर्ता

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