
CG News: @ पुनीत कौशिक। जब पूरा देश फाल्गुन में रंगों और गुलाल से सराबोर रहता है, तब दुर्ग संभाग का चंदनबिरही गांव भक्ति और रामनाम में डूबा रहता है। यहां वर्ष 1926 से होली नहीं मनाई जाती। इस वर्ष गांव में होली न खेलने और रामसप्ताह आयोजन की परंपरा का 100वां साल पूरा हो रहा है।
बच्चों की मौतों के बाद बदली परंपरा
दुर्ग संभाग मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव के बुजुर्गों के अनुसार, 1926 से पहले फाल्गुन माह में लगातार छोटे बच्चों की अकाल मृत्यु हो रही थी। हालात इतने गंभीर थे कि जिन परिवारों में छोटे बच्चे होते, वे महिलाएं फाल्गुन लगते ही मायके चली जाती थीं। उस समय गुंडरदेही रियासत के राजा ठाकुर निहाल सिंह को इसकी सूचना दी गई। उन्होंने गांव पहुंचकर होली न मनाने और उसके स्थान पर रामसत्ता (रामसप्ताह) पाठ कराने का सुझाव दिया। गांव के माता बगदई मंदिर प्रांगण में सात दिन तक 24 घंटे अखंड रामनाम का पाठ शुरू किया गया।
7 दिन, चौबीस घंटे अखंड रामनाम
होली के तीन दिन पहले से ही गांव में रामसप्ताह का शुभारंभ हो जाता है, जो होली के बाद चौथे दिन तक चलता है। गाजे-बाजे के साथ सातों दिन 24 घंटे अखंड पाठ होता है। अन्य गांवों की रामसप्ताह टोलियां भी इसमें शामिल होती हैं। गांव के जगदीश यादव बताते हैं कि पूरा गांव इस दौरान माता बगदई की शरण में रहता है, ताकि किसी भी प्रकार की विपत्ति गांव पर न आए। नई पीढ़ी भी पूर्वजों की इस सौ वर्ष पुरानी परंपरा को पूरे सम्मान से निभा रही है।
रंग-गुलाल से दूरी, दहीलूट की परंपरा
यहां के बच्चों ने न तो रंगों की होली देखी है, न ही पिचकारी का उपयोग किया है। गांव के पंकज कुमार कहते हैं कि उन्होंने कभी गांव में होली पर नगाड़ा बजते नहीं देखा। हालांकि ग्रामीणों को इस बात का कोई मलाल नहीं है। रामसप्ताह के छठे दिन ‘दहीलूट’ का विशेष कार्यक्रम होता है। इस अवसर पर लोग अपने से बड़ों के माथे पर गुलाल लगाकर आशीर्वाद लेते हैं। यही यहां की प्रतीकात्मक होली है।
100वें वर्ष का विशेष उत्साह
इस वर्ष एक मार्च से रामसप्ताह का शुभारंभ होगा। 100वां साल होने के कारण गांव में विशेष उत्साह है। माता बगदई मंदिर परिसर में तैयारियां जोरों पर हैं। गांव के पूनाराम देवांगन बताते हैं कि आयोजन को यादगार बनाने की तैयारी की जा रही है। गुंडरदेही क्षेत्र में अपनी अनूठी परंपरा के कारण चंदनबिरही आज भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यहां होली के रंग नहीं उड़ते, लेकिन रामनाम की गूंज और आस्था का रंग पूरे गांव को सराबोर कर
देता है।
Updated on:
03 Mar 2026 01:41 pm
Published on:
03 Mar 2026 01:40 pm
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