16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अरहर दाल की कीमत 145 रुपए किलो के पार

अरहर दाल की कीमत में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हालत यह है कि पखवाड़ेभर में ही 100 से 120 रुपए किलो बिक रही अरहर की दाल अब 145 रुपए के पार पहुंच गई है। दरअसल जिले सहित प्रदेश की बाजार और दाल मिलें 80 फीसदी विदेशी आयात पर निर्भर है।

3 min read
Google source verification
दुनियाभर में फसल खराब, डिमांड के अनुरूप आवक नहीं

लोकल बाजार में भी स्टॉक पर्याप्त नहीं, आगे और भी कीमत बढऩे की आशंका

हेमंत कपूर/दुर्ग . अरहर दाल की कीमत में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हालत यह है कि पखवाड़ेभर में ही 100 से 120 रुपए किलो बिक रही अरहर की दाल अब 145 रुपए के पार पहुंच गई है। दरअसल जिले सहित प्रदेश की बाजार और दाल मिलें 80 फीसदी विदेशी आयात पर निर्भर है। वहीं बारिश व दूसरे प्राकृृतिक आपदाओं के कारण भारत सहित पूरी दुनिया में इस बार अरहर की फसल प्रभावित रही। इसका असर अब लोकल बाजार पर पड़ रहा है।

विदेशी आयात पर अरहर के लिए 80त्न बाजार निर्भर
जिले में अरहर की खेती नहीं के बराबर होती है। कवर्धा को छोड़कर सभी पड़ोसी जिलों का भी लगभग यही हाल है। इसके चलते अरहर दाल के मामले में जिले सहित प्रदेश के अधिकतर बाजार बाहरी आवक पर निर्भर रहता है। व्यापारियों की मानें तो 80 फीसदी अरहर की आवक विदेशों से होती है। विदेशी अरहर को मंगाकर स्थानीय स्तर पर मिलिंग करते हैं। करीब 20 फीसदी दाल की पूर्ति स्थानीय व अन्य प्रदेशों के आवक से हो पाती है। सामान्य स्थिति में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से दाल की आवक जिले में होती है, लेकिन विदेशी आवक नहीं के बराबर होने से वहां भी संकट की स्थिति है। ऐसे में डिमांड के अनुरूप बाजार में अरहर दाल नहीं आ रही है। व्यापारियों के पास भी स्टॉक बेहद कम हो गया है।

निजी कंपनियों द्वारा स्टॉक से बढ़ी मुसीबत
दुनियाभर में अरहर की कमी के साथ निजी कंपनियों द्वारा भारी भरकम स्टॉक कर लिया जाना भी कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण बताया जा रहा है। व्यापारियों की मानें तो घरेलू जरूरतों के सामग्रियों की बाजार में हाल ही उतरे बड़े व्यापारिक घरानों ने संकट को भांपते हुए पहले ही स्टॉक कर लिया है। लिहाजा उनके ही स्टोर में पर्याप्त मात्रा में अरहर व दाल उपलब्ध है।

खेती को बढ़ावा देने की दरकार
अरहर दाल की उपलब्धता में कमी और महंगाई हर साल की बात है। इससे बचने के लिए दाल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए दलहन की फसलों को बढ़ावा दिए जाने की दरकार है। दलहन की उत्पादकता के लिहाज से जिले की स्थिति अच्छी नहीं है। जिले में करीब 800 हेक्टेयर में दलहन की खेती होती है। पिछली बार 573 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यहां 430 मिटरिक टन दाल की पैदावार हुई थी।

100 से 200 क्विंटल स्टॉक भी नहीं
स्थानीय व्यापारियों ने बताया कि शासन ने व्यापारियों के लिए 2000 क्विंटल तक स्टॉक की सीमा तय की है, लेकिन व्यापारियों के पास 100 से 200 क्विंटल भी दाल का स्टॉक नहीं है। जिले में दाल की करीब 10 मिले हैं। बाजार में अरहर की आवक नहीं होने से ये मिलें भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं। व्यापारियों ने बताया कि अरहर की आवक नहीं होने से अकोला की 450 में से 350 दाल मिले बंद हो गई हंै।

पखवाड़ेभर पहले तक
सामान्य क्वालिटी : 80 से 90 रुपए प्रति किलो
बेस्ट क्वालिटी : 100 से 120 रुपए/किलो

अब की स्थिति
सामान्य क्वालिटी : 100 से 125 रुपए/किलो
बेस्ट क्वालिटी : 145 से 150 रुपए/किलो

अब अफ्रीका के अरहर का इंतजार
अरहर की कमी और दाल की कीमतों में बढ़ोतरी का क्रम नई फसल की आवक तक बरकरार रहने की संभावना है। बताया जा रहा है कि अगस्त में अफ्रीकी देशों से अरहर की नई फसल की आवक शुरू हो जाती है। इसके बाद स्थानीय बाजार को कुछ राहत मिल सकती है। भारत में अरहर की नई फसल जनवरी में आती है।

चने की दाल और सब्जियों को बनाया विकल्प
अरहर दाल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए लोग अब इसकी खरीदारी कम कर रहे हैं। लोकल व्यापारियों के मुताबिक करीब इन दिनों 60 से 70 फीसदी तक अरहर दाल की बिक्री घट गई है। लोग इसकी जगह चने की दाल और टमाटर और ताजी सब्जियों को विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। चने की दाल 50 से 60 रुपए किलो मिल रही है।