
कोंटा से लौटकर दाक्षी साहू की ग्राउंड रिपोर्ट@भिलाई. छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर और तीन राज्यों की सीमा में बसे सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक में भोले-भाले दोरला आदिवासियों की नींद महज एक दूरबीन देखकर उड़ जाती है। माओवादियों के गढ़ में पोलावरम के बनने से 40 हजार आदिवासी परिवारों पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।
राष्ट्रीय सिंचाई परियोजना के डूबान क्षेत्र में दोरला जनजाति का मुख्य बसाहट कोंटा व 18 ग्राम पंचायत है। दूरबीन से डरना सुनकर शायद आपको मजाक लगे, लेकिन जब ग्राउंड जीरो में हम पहुंचे तो यही हकीकत और डर हर दोरला के चेहरे पर नजर आई। ये दूरबीन कोई आम दूरबीन नहीं बल्कि पोलावरम बांध के सर्वे की दूरबीन है, जो विकास के नाम पर इनके त्रासदी की कहानी लिखने बेकरार है।
दूरबीन देखकर भाग जाते हैं लोग
कोंटा से लगभग 15 किमी. अंदर घने जंगल के बीच मुल्लाकिशोरी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बसा मेट्टागुड़ा गांव पोलावरम बांध के डूबान क्षेत्र में है। गांव में दोरला जनजाति के लोग निवास करते हंै। यहां पहुंचने का एकमात्र रास्ता घने जंगलों की पगडंडी है। जिस पर बड़ी मुश्किल से मोटरसाइकिल चल पाती है। गांव के ठीक पहले नाले में बने पुल को कुछ साल पहले नक्सलियों ने विस्फोट से उड़ा दिया था।
जब पत्रिका की टीम यहां पहुंची तो सरपंच सोयम मार्को जो मूलत: दोरली बोलती हैं, उन्होंने टूटी-फूटी ङ्क्षहदी में बताया कि दूरबीन देखना तो छोड़ यहां दूरबीन का नाम सुनकर भी लोग डर जाते हैं। दो महीने पहले सर्वे की टीम गांव से गुजरी तब से लोग एक दिन भी चैन से नहीं सो पाए हैं।
हमारा सब कुछ उजड़ जाएगा तो कहां जाएंगे
पत्रिका टीम के साथ पंचायत के सचिव ने दोभाषिए की भूमिका निभाते हुए जब गांव के मड़कम सिंघम से पूछा कि पोलावरम बांध बन जाएगा तो क्या करोगे। दोरली में अनुवाद सुनकर मड़कम सिंघम की आंखें आंसू से भर गई। मड़कम ने लडख़ड़ाती हुए जुबान से बताया कि पोलावरम नहीं ये हमारा विनाश है। हमारा सब कुछ उजड़ जाएगा। कोई यहां सुनता भी नहीं किसे, हम अपनी पीड़ा बताएं। जंगल से हमें निकाल देंगे तो हमारा जीवन नष्ट हो जाएगा। मड़कम के जैसे ही इस गांव में रहने वाले लगभग 80 परिवार के चेहरे पर विस्थापन का डर आंसुओं के रूप में छलक रहा था।
पोलावरम बांध से सहना पड़ेगा इतना नुकसान
आंध्रप्रदेश के सीम्रांध में बन रहे पोलावरम परियोजना से सुकमा जिले केलगभग 40 हजार परिवार को विस्थापन का दंश झेलना पड़ सकता है। जिसमें दोरला जनजाति की 70 फीसदी आबादी शामिल है। राष्ट्रीय सिंचाई परियोजना के डूबान क्षेत्र में दोरला जनजाति का मुख्य बसाहट कोंटा और 18 ग्राम पंचायत है।
जानकारों के मुताबिक बांध की ऊंचाई 45.75 मीटर से अधिक होने पर सुकमा जिले के राष्ट्रीय राजमार्ग का एर्राबोर से कोंटा के बीच 13 किलोमीटर का हिस्सा, और लगभग 6 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन डूब जाएगी। तहसीलदार कोंटा की राज्य शासन को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार परियोजना के डूबान से दोरला जनजाति के विलुप्त होने का खतरा है। ऐसा होने पर दोरला संस्कृति भी पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी।
Published on:
21 Nov 2017 01:07 pm
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