
मुकेश देशमुख/ दुर्ग . दुर्ग-बेमेतरा रेल लाइन प्रोजेक्ट को शुरुआत में ही बड़ा झटका लगा है। रेल मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट को नुकसान का सौदा बताते हुए अपने हाथ खींच लिए है। दरअसल सर्वेक्षण रिपोर्ट में प्रस्तावित ट्रैक पर सिर्फ यात्री रेल संचालन की ही संभावना नजर आर्ई है। बिना गुड्स ट्रेन, रेलवे को प्रोजेक्ट पर भारी-भरकम खर्च करना अनुचित लग रहा है। रेल मंत्रालय ने गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल दी है। यानी रेलवे उसी सूरत में प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर सोचेगा जब राज्य सरकार भागीदारी करे।
छत्तीसगढ़ में जिन तीन नई रेल लाइन के लिए मौजूदा वित्तीय वर्ष के बजट में प्रावधान किया था इसमें मंदिर हसौद से अभनपुर, दल्लीराजहरा से रावघाट के साथ बेमेतरा से बिलासपुर रेल लाइन शामिल थी। केंद्रीय बजट में 500 करोड़ के फंड की घोषणा की गई थी। 2012 के प्रस्तावित इस रेल लाइन प्रोजेक्ट के आगे बढऩे की उम्मीद जागी थी। दुर्ग सांसद की पहल पर रेलवे ने सर्वे रिपोर्ट रेल बोर्ड के समक्ष पेश की थी।
प्रस्तावित रेल लाइन को आप भी देखें
दुर्ग से बेमेतरा होते हुए बिलासपुर तक जाने वाले 200 किमी रेल लाइन प्रस्तावित है। वर्ष 2012 में किए गए प्राथमिक सर्वे के अनुसार दुर्ग-नंदनी अहिवारा-बेरला-नवागढ़-मुंगेली होते हुए बिलासपुर पहुंचेगी। इस रेल मार्ग से न केवल दुर्ग-बिलासपुर के बीच एक वैकल्पिक रेल लाइन तैयार होगी।
१. नंदनी अहिवारा होते बेमेतरा तक केवल यात्री रेल ही चलाया जा सकता है। इस रुट पर यात्री रेल के अलावा गुड्स ट्रेन नहीं चलाया जा सकता।
२. कवर्धा से लौह अयस्क खनन को लेकर बीएसपी ने पहले ही कदम पीछे कर लिए थे, इसलिए परिवहन भाड़ा के जरिए आय का स्रोत नजर नहीं आ रहा।
३. प्रस्तावित रूट पर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर नहीं है और न ही भविष्य के लिए इस तरह की कोई योजना है। ऐसे में रेलवे सिर्फ पैसेंजर को ही चला पाएगा।
४.बिलासपुर से दुर्ग के लिए यात्री गाडिय़ों का संचालन भी संभव नहीं है, क्योंकि इसमें रायपुर छूट जाएगा और अन्य स्टेशन से अपेक्षित यात्री नहीं मिलेंगे।
प्रदेश सरकार हाथ बढ़ाए तो बने बात
सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद रेल मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह इस परियोजना को तभी आगे बढ़ाएगी जब प्रदेश सरकार उसके साथ परियोजना में शामिल हो। इससे रेल परियोजना में केंद्रीय मंत्रालय के साथ राज्य शासन का भी अंशदान होगा। ऐसा होने पर ही प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
रेलवे को परिवहन से फायदे का गणित
गुड्स ट्रेन का वैसे तो १०० से लेकर २०० श्रेणी हैं। इसी के हिसाब से ही भाड़ा निर्धारित होता है। रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि सबसे कम भाड़ा कम्यूनिट कॉमन यूज सामानों का होता इसमें फल से लेकर आनाज शामिल है। इसके बाद अन्य सामान के परिवहन का भाड़ा निर्धारित है। वर्तमान में सबसे अधिक भाड़ा रेलवे को पेट्रोलियम पदार्थ के परिवहन से मिल रहा है।
एक किलोमीटर नया ट्रैक बनाने के लिए ८० से ९० लाख रुपए खर्च आता है। अगर रुट में माइनर केनाल है तो यह बजट एक करोड़ तक भी चला जाता है। जिस रूट का सर्वे किया गया था उसकी दुर्ग जंक्शन से दूरी ९३ किलोमीटर था। नंदनी तक बीएसपी ने पहले ट्रैक बिछ चुका है। सर्वे ८२ किलोमीटर तक के लिए था। लाइन बिछाने में रेलवे को लगभग ८२ करोड़ रुपए खर्च करना पड़ता।
जमीन अधिग्रहण मुश्किल : रेलवे के लिए सबसे बड़ी चुनौती ट्रैक के लिए जमीन अधिग्रहण की होती है। एक तरफ तो लोगों की सहमति लेना और फिर इसका मुआवजा देने की प्रक्रिया आसान नहीं होती। जमीन अधिग्रहण की नई गाइडलाइन में मौजूदा दर से पांच गुना अधिक भुगतान करना होता है।
डोंगरगढ़-खैरागढ़ से कवर्धा-बिलासपुर
रेलवे को दुर्ग-बेमेतरा से अधिक डोंगरगढ़-बिलासुपर रेल लाइन में फायदा नजर आ रहा हैै। डोंगरगढ़ से खैरागढ़, गंडई होते हुए कवर्धा और फिर वहां से बिलासपुर तक ट्रैक बिछाना प्रस्तावित है। ऐसे में कुछ ही दूरी पर एक और रेल लाइन या कहें समानांतर एक और रेल लाइन प्रोजेक्ट को शुरू करने के बजाय रेलवे किसी एक पर फोकस करेगा।
रेल मंत्रालय ने अपनी मंशा चिट्ठी लिखकर बता दी
सांसद ताम्रध्वज साहू ने कहा कि दुर्ग-बेमेतरा रेल लाइन सर्वे के बाद लोक सभा में कार्य की प्रगति जानने प्रश्न उठाया था। जवाब में तत्कालीन रेल मंत्री ने स्थिति को स्पष्ट किया था कि दुर्ग-बेमेतरा रेल लाइन रेलवे के लिए नुकसान का सौदा है। यह भी बताया था कि अगर राज्य शासन मदद करे तो वे रेल लाइन बिछाने पर विचार कर सकती है। इस आशय का मेरे पास रेल मंत्रालय से पत्र भी आया है।
Published on:
19 Nov 2017 04:09 pm
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