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नक्सलियों के डर से बंदूक थामने वाले हाथों ने कभी सोचा नहीं था जिंदगी यूं बदल जाएगी, ITBP ने 26 गांव के 505 युवाओं को बनाया हुनरमंद

राजनांदगांव जिले के धुर नक्सल प्रभावित गांवों में पढ़ाई छोड़ चुके 800 से ज्यादा युवाओं ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी जिंदगी अचानक ही बदल जाएगी।

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भिलाई

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Dakshi Sahu

Dec 05, 2017

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कोमल धनेसर@भिलाई. राजनांदगांव जिले के धुर नक्सल प्रभावित गांवों में पढ़ाई छोड़ चुके 800 से ज्यादा युवाओं ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी जिंदगी अचानक ही बदल जाएगी। इन युवाओं के क्षेत्र में अपने घर-परिवार से दूर माओवादियों से लोहा लेने पहुंची 'इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस ने उन्हें जीवन में आगे बढऩे का वह रास्ता दिखाया जिसमें चलकर वे अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकें।

वर्षों पहले पढ़ाई छोड़ चुके इन युवाओं की काउंसिलिंग कर आईटीबीपी ने उनमें कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा किया। उसी का नतीजा है कि 26 गांव के 331 युवाओं ने प्लास्टिग इंडस्ट्रीज में नौकरी पाकर अपनी मंजिल हासिल की। आठवीं-दसवीं तक की पढ़ाई छोड़ चुके इन युवाओं को सालाना एक से डेढ़ लाख रुपए का पैकेज मिल रहा है।
खास बात यह है कि इनमें करीब 100 लड़कियां भी शामिल हैं।

बंगलुरु, पुणे, नोयडा, हरिद्वार जैसे महानगरों में ये युवा अपनी जिदंगी नए सिरे से शुरू कर चुके हैं। आईटीबीपी के अधिकारी कहते हैं कि वे केवल यहां माओवादियों से लोहा लेने नहीं आए बल्कि ऐसे युवाओं को नई राह दिखाने भी आएं हैं ताकि वे किसी भटकावे में न आएं और एक अच्छे नागरिक बनकर अपने जीवन को बेहतर बनाए।

11 महीने पहले किया चयन
आईटीबीपी की चार बटालियन राजनांदगांव जिले के माओवाद प्रभावित क्षेत्र में तैनात हैं। तब पता चला कि यहां के युवाओं को अगर रोजगार से जोड़ा जाए तो वे माओवाद की ओर आकर्षित नहीं होंगे। तभी क्षेत्रीय मुख्यालय बंगलुरु ने युवाओं के लिए सिविक एक्शन प्लान बनाया। जिसमें इन युवाओं के पैरेंट्स की काउसिलिंग की गई। 822 युवाओं का चयन किया जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी।

हुनरमंद बनाया रोजगार भी दिलाया
छत्तीसगढ़ राज्य कौशल विकास प्राधिकरण के जरिए पहले 505 युवाओं को केमिकल एंड फर्टिलाइजर मिनिस्ट्रिी के सीआईपीईटी ( सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लॉस्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी) से अलग-अलग कोर्स में ट्रेंड किया गया। इनमें से पहले 4 से 6 महीने के इस कोर्स के बाद कुछ महीने पहले ही 243 युवाओं का चयन महानगरों में स्थित प्लॉस्टिक इंडस्ट्रीज में किया गया।

गांव से निकलते ही बदली जिंदगी
बंगलुरु, पुणे, नोएडा जैसे बड़े शहरों में नौकरी कर रहे यह युवा अब बिल्कुल बदल गए हैं। नए विजन के साथ वे गांव से बाहर अपनी नई दुनियां बसा चुके हैं। अब वे जब गांव आते हैं तो उन्हें देखकर दूसरे युवा भी उनकी तरह बनने की इच्छा व्यक्त करते हैं तो वे उन्हें अब सीधे आईटीबीपी के कैंप का रास्ता दिखाते हैं जहां से उनका जीवन बदला।

सही दिशा जरूरी
डीआईजी आईटीबीपी छत्तीसगढ़, अशोक नेगी ने बताया कि जब युवाओं को सही समय पर अच्छी दिशा मिल जाए तो किसी के बहकावे में नहीं आएंगे। माओवादी क्षेत्र में इसी तरह के सिविक एक्शन प्रोग्राम के तहत ही युवाओं की मानसिकता को बदलकर आईटीबीपी उन्हें बेहतर जिंदगी का रास्ता दिखा रही है।