
कोंटा से लौटकर दाक्षी साहू की रिपोर्ट@भिलाई. नेशनल प्रोजेक्ट का दर्जा प्राप्त आंध्रप्रदेश में बन रहा पोलावरम बांध छत्त्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए डेथ वारंट साबित हो गया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज ढाई साल में लगभग 2.50 लाख आदिवासियों ने बस्तर छोड़ दिया है। पलायन करने वालों में २० फीसदी कोंटा ब्लॉक के अति पिछड़े आदिवासी हैं, जो पोलावरम बांध के डूबान क्षेत्र में आ रहे हैं। इसकी पुष्टि स्वयं कोंटा विधायक कवासी लखमा और मारवाही विधायक व जोगी कांग्रेस के नेता अमित जोगी ने की है।
जल, जंगल जमीन की लड़ाई लडऩे वाले आदिवासी सरकार की खामोशी को अपना विनाश मानकर खुद ही अपना घर-बार छोड़ रहे हैं। पत्रिका की टीम जब सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक पहुंची तब यह कड़वी सच्चाई सामने आई। डूबान क्षेत्र में आने वाले 18 ग्राम पंचायत के लगभग 44 गांवों के ज्यादातर घरों में बूढ़े और बच्चों के अलावा कोई नहीं मिलता।
युवा व अधेड़ परिवार के साथ तेलंगाना ,आंध्रप्रदेश व उड़ीसा की सीमा से सटे कोत्तागुड़म, चिन्तलपाड, गैंधीगुफा, गंगुल नागाराम, सोराराम, मुलागुडम, धर्मा, नागाराम, आसिदपाड, गट्ठामल्लाराम, रेगडग़ट्टा जैसे गांवों में जकर बस गए हैं। पोलावरम के खौफ के चलते वापस कोंटा, सुकमा नहीं लौटना चाहते। कोंटा विधायक ने बताया कि पलायन करके तेलांगना में बसे आदिवासियों से वे स्वयं बातचीत करने पहुंचे, लेकिन उनके लाख समझाने के बावजूद पोलावरम के डर से आदिवासी घर नहीं लौटना चाहते।
हमें सरकार इंसान मानती तो पानी के सैलाब में नहीं डुबोती
पोलवरम के डूबान में आने वाले दोरला आदिवासियों के गांव मेट्टागुड़ा के कारम जोगा, कवासी कन्ना जैसे ही दर्जनभर लोगों ने अपनी पीड़ा पत्रिका को बताते हुए कहा कि उनके पास पलायन के अलावा और कोई चारा नहीं बचा। सरकार तो उन्हें इंसान मानती नहीं है। वो कहती है या तो आप सरकार के आदमी हो या माओवादियों के। पोलावरम के रूप में पानी का सैलाब भी पीछे-पीछे आ रहा। इसलिए खुद का अस्तित्व बचाने धीरे-धीरे सब गांव छोड़ रहे हैं।
एक साल पहले बताया था डेथ वारंट- अमित जोगी
जोगी कांग्रेस के नेता मारवाही विधायक अमित जोगी ने बताया कि पोलावरम बांध पर सरकार और विपक्ष की चुप्पी को देखकर एक साल पहले ही इसे आदिवासियों का डेथ वारंट बता दिया था। मोदी सरकार ने परियोजना की डेड लाइन २०१८ पहले ही घोषित कर दिया है। ये भारत के इतिहास में पहली दफा हो रहा है, जब डूबने वाले लोगों से पूछे बगैर ही उनका सबकुछ पानी में डूबो दिया जा रहा है। आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की तैयारी है।
Published on:
02 Dec 2017 01:12 pm
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