
जब महाप्रभु जगन्नाथ से नाराज हो गई माता लक्ष्मी, जानिए क्यों माता ने गुस्से में दिए जगत के स्वामी को ताने
भिलाई. रथ पर तीन दिन रहने के बाद महाप्रभु जगन्नाथ ने देखा कि देवी लक्ष्मी ने अब तक दरवाजा नहीं खोला तो वे स्वयं ही रथ से उतरकर अपने बड़े भाई और बहन सुभद्रा को लेकर श्रीमंदिर के दरवाजे तक जा पहुंचे। गुस्साई देवी लक्ष्मी दरवाजे के पीछे से ही महाप्रभु के संग बात करने लगी और बातों ही बातों मे ंउन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ कि पति-पत्नी की लड़ाई में बड़े भाई क्यों भूखे रहे..? शुक्रवार को जब श्रीजगन्नाथ मंदिर सेक्टर 4 में महाप्रभु और देवी लक्ष्मी के संवाद काव्य के रूप में चला। उड़ीया भाषा में काव्य और पदावली के माध्यम से सेक्टर-4 में देवी लक्ष्मी के संवाद को पुजारी निलांचल दास और महाप्रभु की ओर से संवाद को पितवास पाढ़ी ने किया। महासचिव सत्यवान नायक ने बतयाा कि सांसारिक जीवन में महाप्रभु को भी पत्नी देवी लक्ष्मी से ताने सुनने मिलते हैं। निलांद्री विजय की रस्म शहर के दोनों ही मंदिरों में निभाई गई। जिसके बाद महाप्रभु ने अपने भाई और बहन के साथ श्रीमंदिर में प्रवेश किया।
महाप्रभु और बलभद्र की पसंद के बने व्यंजन
बाहुड़ा यात्रा से श्रीमंदिर लौटने के बाद रथ पर ही सवार महाप्रभु को तीन दिन से अन्न प्रसाद का भोग नहीं लगाया गया था, लेकिन मंदिर में प्रवेश के बाद देवी लक्ष्मी ने बड़े भाई बलभद्र और महाप्रभु जगन्नाथ के पसंद के व्यंजन बनाए। इस मौके पर मंदिर में अन्न प्रसाद का विशेष भोग लगाया गया। इस उत्सव को सफल बनाने में जगन्नाथ समिति के अध्यक्ष वीरेन्द्र सतपथी व महासचिव सत्यवान नायक, बसंत प्रधान, डी त्रिनाथ, अनाम नाहक, कालू बेहरा, भीम स्वांई, संतोष दलाई, सुशांत सतपथी, वृंदावन स्वांई, प्रकाश दास, रंजन महापात्र, त्रिनाथ साहू, बीसी केशन साहू, कवि बिस्वाल, रमेश कुमार नायक, सीमांचल बेहरा, सुदर्शन शांती, कैलाश पात्रो, प्रकाश स्वांई, एस डाकुआ,रवि स्वांई,शंकर दलाई ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
नहीं चाहिए उपहार
तीन दिनों तक रथ में रहने के बाद श्री जगन्नाथ मंदिर के बाहर से ही माता लक्ष्मी से पट खोलने का आग्रह कर किया पर वे नहीं मानी। भगवान ने जब कहा कि बरसात व ठंड से उनका शरीर कांप रहा है। इन नौ दिनों में मेरे शरीर ने काफी कष्ट उठाए हैं, तो माता लक्ष्मी बोल पड़ी आप अपने नंदी घोष में बैठ कर बड़े मजे से करोड़ों श्रद्धालुओं का लाया भोग खाते रहे। आखिर तुम्हे कैसा कष्ट? भगवान ने माता लक्ष्मी को मनाते हुए कहा कि वे उनके लिए स्वर्ण अलंकार, शंखा साड़ी एवं सुन्दर वस्त्र व हाथों के लिए सोने की चूडिय़ां लाए हैं। यह सुनकर माता लक्ष्मी नाराज होकर कहती हैं, आप जो भी चीज लाए हो अपनी पीले मुंह वाली बहन को दे दो। उन्हीं को लेकर आपने यात्रा की थी। तब भगवान ने कहा कि मेरी छोटी सी बहन पर इतना क्यों नाराज हो रही हो। वो तो अभी बहुत छोटी है। माता लक्ष्मी फिर कह उठती है कि आप जिसे छोटी बता रहे हो वह छोटी नहीं है। वह पल में त्रिलोक का संहार कर सकती है। माता की निष्ठूर वाणी सुन कर श्री जगन्नाथ कहते हैं कि पति और पत्नी की लड़ाई में बड़े भाई बलभद्र की क्या गलती है वे भूखे हैं। जब भगवान बलभद्र देव ने माता लक्ष्मी से द्वार खोलने का आग्रह किया तो माता लक्ष्मी दासियों को द्वार खोलने का आदेश दिया। श्री मंदिर के पट खुलते ही भगवान श्री जगन्नाथ स्वामी माता लक्ष्मी को समस्त उपहार देते हुए उनसे वादा करते हैं कि झूलन यात्रा में वे माता लक्ष्मी को साथ लेकर जाएंगे। प्रभु के मंदिर प्रवेश के बाद माता लक्ष्मी भगवान को उनके मनपसंद पकवान बनाकर खिलाती हैं।
Published on:
24 Jul 2021 06:21 pm
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