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बेटियों का मंच में गाना अच्छा नहीं मानते थे लोग, उस दौर से निकलकर छत्तीसगढ़ की सुर कोकिला बनीं पद्मश्री ममता

दुर्ग निवासी ममता चंद्राकर (Mamta Chandrakar) के पिता दाऊ महासिंह एक नामी लोककलाकार थे। नन्ही ममता के पिता से लोकसंगीत की शिक्षा ली।

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भिलाई

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Dakshi Sahu

May 30, 2021

बेटियों का मंच में गाना अच्छा नहीं मानते थे लोग, उस दौर से निकलकर छत्तीसगढ़ की सुर कोकिला बनीं पद्मश्री ममता

बेटियों का मंच में गाना अच्छा नहीं मानते थे लोग, उस दौर से निकलकर छत्तीसगढ़ की सुर कोकिला बनीं पद्मश्री ममता

कोमल धनेसर@भिलाई. छत्तीसगढ़ की स्वर कोकिला पद्मश्री ममता चंद्राकर (Padma shri Mamta Chandrakar ) ने अपने सपनों के राजकुमार की कल्पना कुछ ऐसी की थी कि जो उसके संगीत को समझ उनकी साधना में साथ दें सकें। पर मन में एक डर था कि कही डॉक्टर या इंजीनियर से शादी हो गई तो वह कैसे समझाएंगी? पर मां सरस्वती की कृपा ऐसी रही कि जीवनसाथी के रूप में प्रेम चंद्राकर से नाता जुड़ा। कलाप्रेमी प्रेम छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक होने के साथ ही अच्छे गीतकार भी है। बस क्या था ममता ने प्रेम के संग अपने जीवन की दूसरी पारी शुरू की और इस सफर में अपने जीवनसाथी का साथ पाकर ममता ने पद्मश्री तक का सफर तय किया और आज वे एशिया के पहले संगीत विवि इंदिरा कला एवं संगीत विवि की कुलपति हैं। सबसे ज्यादा खुशी ममता को इस बात की है कि जिस विश्वविद्यालय में उसने संगीत की शिक्षा व डिग्री ली, आज वही कुलपति बनकर वे आने वाली युवा पीढ़ी के लिए संगीत और कला में कॅरियर की संभावनाओं को निखार रही हैं। उनका मानना है कि लोकसंगीत की शिक्षा लेने के बाद हर युवा मंच तक पहुंचे और इसे ही अपने कॅरियर के रूप में आगे बढ़ाए जिससे देश-विदेश तक छत्तीसगढ़ का लोकसंगीत पहुंच सकें।

9 साल की उम्र में मंचन
दुर्ग निवासी ममता चंद्राकर के पिता दाऊ महासिंह एक नामी लोककलाकार थे। नन्ही ममता के पिता से लोकसंगीत की शिक्षा ली। वे बताती हैं कि पिताजी चाहते थे कि वे दाऊ रामचंद्र देशमुख से विधिवत शिक्षा लें, लेकिन उन्होंने सिखाने से मना कर दिया। उसके बाद पिताजी ने लोककला को आगे बढ़ाने सोनहा बिहान नाम की संस्था शुरू की और उसमें पहली बार उन्होंने लोकसंगीत गाया। वे बताती हैं कि आज 62 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने अपनी संगीत साधना नहीं छोड़ी और आज भी मंच पर वे कार्यक्रम दे रही है। वे बताती हैं कि जिस दौर में उन्होंने गाना शुरू किया था तब बेटियों का मंच पर गाना अच्छा नहीं माना जाता था। उन्होंने भी काफी विरोध झेला, लेकिन जैसे-जैसे उन्हें सफलता मिलती गई, लोगों का भी नजरिया बदल गया।

जब 6 साल बंद किया गाना
पद्मश्री ममता 1982 में उनकी नौकरी आकाशवाणी में लग गई थी और 1986 में उनका विवाह प्रेम चंद्राकर के संग हुआ। वे बताती हैं कि शादी के कुछ साल बाद ऐसा भी वक्त आया, जब उन्होंने 6 साल तक गाना बंद कर दिया। उस वक्त उनके पति ने उनका हौसला बढ़ाया और दोबारा गाने के लिए तैयार किया। आकाशवाणी भोपाल, जगदलपुर, बिलासपुर और रायपुर में सेवा देकर वे सहायक निर्देशक कार्यक्रम प्रमुख के पद से 2018 में सेवानिवृत्त हुई। वहीं 2020 में वे इंदिरा कला एवं संगीत विवि की कुलपति नियुक्त की गई। छत्तीसगढ़ के कई प्रमुख पुरस्कार सहित राज्य अलंकार पाने के बाद वर्ष 2016 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री ने नवाजा।

घर-घर में उनके गीत
पद्मश्री ममता चंद्राकर के गाए लोकगीत, गौरा-गौरी गीत, बिहाव गीत एवं छत्तीसगढ़ी फिल्मों में गाए सैकड़ों गीत आज भी प्रदेश के गांवों में घर-घर में सुने जाते हैं। ममता कहती हैं कि उन्होंने कितने गीत गाए उन्हें खुद याद नहीं, लेकिन उनका प्रयास यह रहा कि अपने गाने के कैसेट और सीडी के जरिए उन्होंने लोकगीतों को सहेजा। ताकि नई पीढ़ी उन्हें सुनकर गुनगुनाएं और उन लोकगीतों तो सीखें। वे बतातीं है कि उनके पति ने भी उनके लिए कई गीत लिखे जिसे उन्होंने अपना स्वर दिया और वे काफी लोकप्रिय भी हुए।