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स्वदेशी तकनीक से लहलहा रहा ड्रैगन फ्रूट

—एक बार लगाने के बाद बहुत कम देखभाल की जरूरत—बीस साल तक देता है उत्पादन भीलवाड़ा जिले के किसान नवाचार कर अपने खेतों में विदेशी फ सलें भी उगा रहे हैं। जिले के ग्राम खजीना के किसान रामेश्वर लाल के बाग में ड्रैगन फ्रूट लहलहा रहे हैं। उनका दावा है कि जिले मेें यह ड्रैगन फ्रूट की पहली खेती है।
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स्वदेशी तकनीक से लहलहा रहा ड्रैगन फ्रूट

स्वदेशी तकनीक से लहलहा रहा ड्रैगन फ्रूट

दो हजार पौधे रोपे
किसान ने बताया कि उन्होंने गुजरात में पहली बार ड्रैगन फ्रूट के पौधों को देखा। इसके बाद कई स्थानों से इसके बारे में जानकारी हासिल की। दो साल पहले वर्ष 2020 में डेढ़ बीघा में इसकी बुवाई शुरू की और दो हजार पौधे रोपे। इसमें करीब ६ लाख रुपए का खर्चा आया। यह अधिक मुनाफा देने वाली नकदी फसल है।

एक पौधे से 25 से 30 किलो तक फल
पहली बार में किसान को पिछले वर्ष दो सौ से तीन सौ फ ल प्राप्त हुए। एक पौधे से पच्चीस से तीस किलो तक फ ल प्राप्त होता है। एक बार पौधा लगने के बाद बीस साल तक उत्पादन देता है। इस फ सल को लेने के लिए उन्होंने स्वदेशी तकनीकी का सहारा लिया।

आइसक्रीम, जैम व जेली के लिए उपयोगी
ड्रैगन फ्रूट से जैम,आइसक्रीम, जेली, जूस और वाइन बनाई जाती है। दवाइयों में भी उपयोग होता है। बाजार में यह फ ल 300 से 800 रुपए प्रति किलो की दर से बिकता है।

ड्रैगन फ्रूट की 150 प्रजातियां
ड्रैगन फ्रूट कैक्टस के पौधे की तरह हैं। इसे देखभाल की बहुत कम जरूरत होती है। ड्रैगन फ्रूट की 150 प्रजातियां हैं। द. अमेरिका के अलावा गुजरात के कच्छ, नवसारी व सौराष्ट्र क्षेत्र में बड़े पैमाने पर इसकी खेती हो रही है। केरल महाराष्ट्र, कर्नाटक, प.बंगाल, तमिलनाडु में भी इसकी खेती होने लगी है।

दिनेश पाराशर — आकोला

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