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गांव में पैंथर घुस आया तो, वन कर्मी भी नजर आएंगे बेबस

भूख-प्यास से विचलित पैंथरों (panther) की दहाड़ से जिले के सघन वन क्षेत्र गूंजने के साथ ही क्षेत्र के लोग दहशत में जी रहे है, इसके बावजूद वन विभाग पैंथर पर नकेल कसने में संसाधनों के अभाव में निहत्था महसूस कर रहा है। हालात ये है कि रेस्कयू के लिए भी वन कर्मी अपनी जान ( life) जोखिम में डालने के साथ ही अपनी जेब से रुपए खर्च कर रहे है।
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If the Panther enters the village, forest workers will also be seen h

If the Panther enters the village, forest workers will also be seen h

नरेन्द्र वर्मा

भीलवाड़ा. भूख-प्यास से विचलित पैंथरों (panther) की दहाड़ से जिले के सघन वन क्षेत्र गूंजने के साथ ही क्षेत्र के लोग दहशत में जी रहे है, इसके बावजूद वन विभाग पैंथर पर नकेल कसने में संसाधनों के अभाव में निहत्था महसूस कर रहा है। हालात ये है कि रेस्कयू के लिए भी वन कर्मी अपनी जान ( life) जोखिम में डालने के साथ ही अपनी जेब से रुपए खर्च कर रहे है।

जिले में वन्य जीव पैंथर की आबादी को लेकर वन विभाग एक दशक से संशय की स्थिति में था, लेकिन पत्रिका (patrika ) ने समाचार अभियान के जरिए 'दुर्घटनाओं में पैंथरों की मौत का आंकड़ा बढऩे के बावजूद वन्य जीव गणना में गत पांच साल में मात्र दो पैंथर दिखाई देने का मामलाÓ उठाते हुए वन्य जीव गणना पर सवाल उठाए थे, इस पर वर्ष २०१९ की वन्य जीव गणना में वन विभाग ने गंभीरता दिखाई तो इस बार जिले के वन्य जीव क्षेत्र में दस पैंथर आंकडों में आ गए और करेड़ा क्षेत्र में पैंथरों के जोड़े अब खुले में शावकों के साथ नजर आने लगे है।

बिन साधन कैसे पकड़े पैंथर
जिले में पैंथर की संख्या बढऩे और आबादी क्षेत्र में इनके घुस आने के बावजूद वन विभाग (forest ) ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए स्वयं को अहसाय महसूस कर रहा है। जिले में वन विभाग की छह रेंज है और मांडलगढ़, आसीन्द व गंगापुर रेंज में तो पैंथर के बढ़ी संख्या में होने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन आबादी क्षेत्र में पैंथरों के घुस आने की स्थिति रेस्कयू कर लोगों को भय मुक्त करने के संसाधान विभाग के पास नहीं है। पैंथर को अचेत करने के लिए ट्रंक्यूलाइज गन की जरुरत होती है, लेकिन ये गन ही नहीं है। अकसर चित्तौडग़ढ़,उदयपुर या अजमेर से ये गन मंगानी पड़ती है।

जेब से खर्च कर रहे पैसा
पैंथर के पकड़े जाने की स्थिति में उन्हें जंतुआलय ( Animal house) ले जने के लिए विशेष पिंजरे की जरूरत होती है, गत वर्ष एक पैंथर को जयपुर ले जाने के लिए विभाग को किराए का पिंजरा युक्त वाहन मंगाना पड़ा। जिले के तीन रेंज क्षेत्र में पैंथर की संख्या कही अधिक है, लेकिन जिले में कुल ही दो पिंजरे है। वही रेंज में गंगापुर, आसीन्द,शाहपुरा व भीलवाड़ा रेंज में तो रेंजर के पास जीप तक की सुविधा नहीं है।जान भी जोखिम में वन रक्षकों की पीड़ा है कि रेस्कयू या जंगल में गश्त के दौरान हिंसक वन्य जीवों से बचाव के लिए लाइफ जैकेट ( jacket) की जरूरत होती है, लेकिन ये जैकेट देखने तक को नहीं मिलती हे। इसी प्रकार हाथ के दस्ताने व जूते तक विभाग के पास नहीं है। जाल, रस्से भी वे निजी स्तर पर जुटाते है। मुसीबते में फंसे वन्य जीवों के रेस्कयू के लिए साधनों का खर्चा भी उन की जेब पर पड़ता है।
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.ये हुए अभी तक के बड़े रेस्कयू
३१ जनवरी २०१९ को आसीन्द के बोरेला चौराहा पर वाहन की चपेट में आने से पैंथर घायल हो गया और उसे जुगाड़ के सहारे जयपुर जंतुआलय ले जाया गया। इसी प्रकार २६ फरवरी २०१९ को आसीन्द के कटार में पानी की तलाश में घुसे पैंथर को ग्रामीणों ने दबोचा, उसके रेस्कयू में भी जान पर बन आई थी। वही करेड़ा के सदबड़ा गांव में २१ अप्रेल २०१८ को पैंथर से स्वयं के बचाव में एक दर्जन लोगों ने लाठियों से हमला कर दिया। इस पैंथर को भी जयपुर ले जाने कई दिक्कतें वन कर्मियों को झेलनी पड़ी।
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मिलें रेस्कयू के लिए संसाधन
वन क्षेत्र में वन्य जीव सुरक्षित रहे और क्षेत्र के लोग भी दहशत मुक्त रहे, इसके लिए वन विभाग सदैव प्रयासरत रहा है, संसाधनों की कमी है, लेकिन जनसहयोग से कार्य करवा रहे है। वनकर्मी भी अपने स्तर पर सहयोग करते है। हिंसक वन्य जीव के रेस्कयू के लिए संसाधन एवं जीवनरक्षक ( gurd) सुविधा मिलें, इसके लिए उच्च स्तर पर लिखा भी है।
ज्ञानचंद, उपवन संरक्षक, भीलवाड़ा

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