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जानिए हमारे वस्त्रनगरी की धर्म-संस्कृति ‘कल्पवृक्षÓ को

भीलवाड़ा। श्री दिगंबर जैन अजमेरा की गोट का बड़ा मंदिर जो कि श्री दिगंबर जैन चतुर्मुखी पारसनाथ कल्पवृक्ष बड़ा मंदिर के नाम से जाना जाता है का नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है ।

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 Know 'Kalpavriksha', the religious culture of our clothing city

Know 'Kalpavriksha', the religious culture of our clothing city

भीलवाड़ा। श्री दिगंबर जैन अजमेरा की गोट का बड़ा मंदिर जो कि श्री दिगंबर जैन चतुर्मुखी पारसनाथ कल्पवृक्ष बड़ा मंदिर के नाम से जाना जाता है का नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है । कुछ सालों पहले यह मंदिर नागौरी मोहल्ले में था। आवागमन आदि में दिक्कत होने से मंदिर को मुनि पुंगवसुधा सागर के सानिध्य एवं मार्गदर्शन में आमलियो की बारी स्थित संगीत कला केंद्र में स्थानांतरित किया। पूर्व में यहां पर पारसनाथ भगवान की एक प्रतिमा लगाने का इरादा ट्रस्ट बोर्ड का था, परंतु कुछ समय पश्चात मुनि सागर यहां आए उन्होंने यहां का अवलोकन किया। इस परिसर में बहुत वास्तु दोष होने के कारण मुनि श्री ने कल्पवृक्ष के नीचे चतुर्मुखी पारसनाथ भगवान विराजमान करने की कल्पना की।


प्रवक्ता पवन कुमार अजमेरा ने बताया कि 3 साल पूर्व 50 बाई 200 फ ीट के भूभाग में मंदिर का निर्माण शुरू हुआ । मुनि सागर के मार्गदर्शन में ही संपूर्ण मंदिर एवं पत्थरों का बना हुआ कल्पवृक्ष और उसके नीचे 7.30 फीट के पारसनाथ भगवान की पद्मासन प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया । यह कल्पवृक्ष भूतल से 20 फ ीट ऊंचा है इसका तना बिदासर के भूरे पत्थरों का एवं पत्तीये पन्न की खदानों में से निकलने वाले हरे पत्थर की बनी हुई है। तने को इस तरह से बनाया गया जैसे कि वास्तविक दिखे । तने पर गाठे, खड्डे आदि उड़ेले गए। ऊपर की पत्ती 9Ó9 के गोलाई में बनी हुई है जिसके ऊपर 6Ó6 और उसके ऊपर 3Ó3 की गोलाई दी गई है । पत्तियों में बहुत ही बारीकी व अच्छी कारीगरी की गई है । इन्हीं विशेषताओं के कारण मंदिर को इंडिया बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया।

मंदिर के मैनेजिंग ट्रस्टी प्रदुमन कुमार अजमेरा ने बताया कि यह कल्पवृक्ष 20Ó20 फ ीट के चौकोर वेदी पर विराजमान है । यह वेदी भी दिगंबर जैन मंदिरों में अब तक शायद देखने को मिली होगी। वेदी मकराना के सफेद पत्थरों से बनाई गई है, इसी मंदिर के प्रथम तल पर 12Ó7 फ ीट की दो स्वर्ण वेदी बनाई गई है। दोनों में करीब 33 जिनबिम्ब विराजमान किए गए। सन् 2016 में पंचकल्याणक हुआ। तत्पश्चात मंदिर का निर्माण हुआ। जून 2019 में वेदी प्रतिष्ठा हुई। तब इन चारों प्रतिमाओं को यहां पर कल्पवृक्ष के नीचे कमल के फू लों पर विराजमान किया गया। पंचकल्याणक अवं वेदी प्रतिष्ठा मुनि सुधासागर के सानिध्य में संपन्न हुई।

यहां पर 108 किलो की एक घंटी लगी हुई है। जो भीलवाड़ा के किसी जैन मंदिर में देखने को नहीं मिलेगी। घंटी की आवाज 100-100 फीट दूर तक सुनाई देती है । इसी मंदिर परिसर में एक टांके का निर्माण भी किया गया है। जिसके अंदर वर्षा ऋ तु का पानी एकत्र किया जाएगा । यह जल साल भर भगवान के अभिषेक शांतिधारा में काम लिया जाएगा। संपूर्ण मंदिर के निर्माण में महेंद्र अजमेरा, सुरेश अजमेरा व युवा इंजीनियर दिलसुख राय भैंसा का विशेष योगदान रहा।
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