
जोंक चिकित्सा यानि लीच थैरेपी प्राचीन काल से उपयोग की जा रही है। इसे आयुर्वेद में जलौकावचारण विधी के नाम से जाना जाता है। जोंकों को प्रभावित अंगों पर छोड़ दिया जाता है।
भीलवाड़ा।
जोंक चिकित्सा यानि लीच थैरेपी प्राचीन काल से उपयोग की जा रही है। इसे आयुर्वेद में जलौकावचारण विधी के नाम से जाना जाता है। जोंकों को प्रभावित अंगों पर छोड़ दिया जाता है। जोंक मुंह से ऐसे एंजाइम छोड़ती है कि व्यक्ति को यह अहसास ही नहीं होने देते कि शरीर से खून चूसा जा रहा है। जोंक दूषित रक्त को ही चूसती है। यहां चित्रकूट धाम में आयोजित संभागस्तरीय आयुर्वेद मेले में इस पद्धति से गंभीर बीमारियों का उपचार किया जा रहा है। इसे देखने के लिए लोग उमड़ रहे हैं।
चिकित्सा शिविर में आयुष चिकित्सक जुगलकिशोर चतुर्वेदी ने बताया, दादी-नानी की कहानियों में खून चूसने के लिए कुख्यात जीव जोंक का इस्तेमाल असाध्य बीमारियों के इलाज में किया जा रहा है। जोंक के खून चूसने की स्वाभाविक खूबी के साथ सामंजस्य बैठाते इसका उपयोग स्वच्छ रक्त के बजाय दूषित रक्त को निकालने में किया जा रहा है। जोंक से उपचार की विधि को आयुर्वेद में जलौकावचारण विधि की संज्ञा दी गई है। इस विधि को 'लीच थैरेपी' भी कहा जाता है। इससे डायबिटिक फुट, गैंगरिन, सोरायसिस, नासूर समेत कई बीमारियों का इलाज हो रहा है। जोंकों को प्रभावित अंगों पर छोड़ दिया जाता है। जोंक मुंह से ऐसे एंजाइम छोड़ती है कि व्यक्ति को यह अहसास ही नहीं होने देते कि शरीर से खून चूसा जा रहा है। जोंक दूषित रक्त को ही चूसती है। दूषित रक्त की समाप्ति से स्वच्छ रक्त प्रवाह होता है, जिससे जख्म जल्दी भरते है।
जोंकों से निकलने वाली लार से खून पतला होता है
जोंको के द्वारा निकलने वाली लार से शरीर का रक्त पतला होता है और रक्त का थक्का नहीं जमता है। यह शरीर में रक्त का संचार अच्छा कर देता है और संयोजी ऊतकों में दर्द के लिए संवेदनशीलता को बढ़ाता है। जोंक चिकित्सा, सूजन और पैर दर्द में भी लाभकारी होती है और त्वचा के मलिनकरण को भी कम कर देती है।
Published on:
02 Jan 2018 12:48 pm
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