
चांदी के बर्तनों में घुलती अफीम, पत्रिका फोटो
Mewar Opium Ritual: मेवाड़ हो या मारवाड़, राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में 'मनुहार' का अपना महत्व है, लेकिन आधुनिकता और दिखावे की अंधी दौड़ ने इस परंपरा को एक घातक कुरीति में बदल दिया है। भीलवाड़ा समेत आसपास के जिलों में शादी-ब्याह से लेकर मृत्युभोज तक में अफीम घोलना अब केवल नशा नहीं, बल्कि एक 'स्टेटस सिंबल' बन चुका है।
जो समाज कभी अपनी नैतिकता के लिए जाना जाता था, वह आज चांदी के गिलासों में अफीम घोलकर अपनी बर्बादी का जश्न मना रहा है। पत्रिका ने अमल घोलने की सच्चाई टटोली तो सामने आया कि परंपरा के नाम पर यह मनुहार समाज को खोखला ही करती नजर आ रही है।
अफीम की यह घातक मनुहार मुख्य रूप से भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ और मारवाड़ के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय है। भीलवाड़ा जिले में कुछ जाति बाहुल्य क्षेत्रों में इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है। यदि किसी आयोजन में अफीम नहीं घोली जाए, तो उसे कमतर आंका जाता है।
आयोजनों में अफीम घोलने के लिए विशेष और महंगे उपकरणों का उपयोग होता है। रसूखदार लोगों ने इसके लिए सोने और चांदी के बर्तन बनवा रखे हैं। चांदी के जिस खास गिलास में अफीम घोली जाती है, उसे स्थानीय भाषा में 'घंटी' कहा जाता है। सामान्य परिवार भी अपनी झूठी शान दिखाने के लिए एक ही आयोजन में 1.5 से 2 लाख रुपए तक की अफीम पानी में बहा देता है।
सरकार लाइसेंस पर अफीम की खेती करवाती है। इसी की आड़ में तस्करी होती है। लाइसेंसधारी किसानों से अवैध तरीके से खरीदी गई अफीम या फिर तस्करी के जरिए आने वाला माल इन सामाजिक आयोजनों की 'शान' बनता है। पुलिस प्रशासन ने समय-समय पर 'अमल' की इस कुरीति पर अंकुश लगाने के दावे किए। इसके बावजूद सामाजिक परंपरा के नाम पर पुलिस व समाज का एक तबका आंखें मूंदे है।
जिले के कई हिस्सों में अभी अफीम की फसल लहलाई हुई है। तस्करों की नजरें खेतों से लेकर अफीम काश्तकारों पर लगी हुई है। ऐसे में पुलिस अधीक्षक धर्मेन्द्र सिंह यादव ने आयोजनों के दौरान अफीम का नशा घोलने वालों के खिलाफ भी मुहिम छेड़ रखी है। एक माह के दौरान पुलिस ने ऐसे आयोजनों को लेकर 9 कार्रवाई की है। इनमें एक ग्राम पंचायत के प्रशासक को भी जेल जाना पड़ा है।
आयोजनों में अफीम घोलने का यह चलन न केवल आर्थिक बोझ डाल रहा है, बल्कि युवाओं को नशे की गर्त में धकेल रहा है। कर्ज लेकर झूठी शान के लिए अफीम पिलाना परिवारों को दिवालिया बना रहा है। 'मनुहार' के नाम पर शुरू हुआ यह शौक कब जानलेवा लत बन जाता है, पता ही नहीं चलता।
नशे की मांग अवैध तस्करी और अपराध के नेटवर्क को मजबूत कर रही है। यह मनन करना भी जरूरी हो गया कि क्या चांदी की 'घंटी' में घुली अफीम हमारे संस्कारों से बड़ी हो गई है? समय आ गया है कि समाज के प्रबुद्ध जन आगे आएं और इस 'काले कलंक' को परंपरा कहना बंद करें।
Published on:
09 Mar 2026 08:55 am
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