ठंडे इलाकों में ही नहीं, अब भीलवाड़ा में भी हो रही स्ट्रॉबेरी की खेती


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By: Suresh Jain

Updated: 29 Mar 2019, 05:33 PM IST

 

भीलवाड़ा।

 

पहाड़ी क्षेत्रों की माने जाने वाली स्ट्रॉबेरी की खेती अब भीलवाड़ा जिले में भी होने लगी है। जिले के नन्दराय के एक किसान के प्रयास रंग लाए और स्ट्रॉबरी से बेहतर मुनाफा मिलने लगा। अभी खपत भीलवाड़ा में हो रही है लेकिन बहुद्देशीय कम्पनियों के जैम, पेय, कैंडी आदि में स्ट्रॉबरी के इस्तेमाल से इसे प्रोत्साहन मिल रहा है।

 

नन्दराय के चन्द्रसिंह चौधरी ने हिमाचल और महाबलेश्वर में उगने वाली स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की। एक बीघा क्षेत्र में 11 हजार पौधे लगाए, जो चित्तौडग़ढ़ के कनेरा से लाए। एक पौधे पर खर्च करीब 15 रुपए आया। इसे लगाने व अन्य खर्च 10 रुपए प्रति पौधा और आया। तीन माह में फसल तैयार हो गई। अब रोज 70 से 80 किलो स्ट्रॉबेरी निकल रही है। कृषि उपज मण्डी में 100 से 150 रुपए प्रतिकिलो बिक रही है। जनवरी से अप्रेल तक इन्हें २ हजार किलो से अधिक फल मिलेंगे। यानी 2 से 3 लाख रुपए आमदनी होगी।

 

चौधरी ने बताया, स्ट्रॉबेरी के लिए ठंडा वातावरण चाहिए। पूरी तरह जैविक खाद का उपयोग करते हैं। अभी कम जगह में लगाई, जिसकी खपत स्थानीय बाजार में हो जाती है। अब दायरा बढ़ाएंगे व बाहर भेजेंगे। स्ट्रॉबेरी की खेती देखने अन्य जगह से किसान भी आते हैं। कुछ माह में इसकी खेती करने वाले किसानों की संख्या बढ़ेगी।

 

माण्डल-बिजौलियां में भी पैदावार

 

उद्यान विभाग के अनुसार चित्तौडग़ढ़ जिले में स्ट्रॉबेरी की अच्छी फसल हो रही है। उसे देख अन्य किसान भी आगे आए। माण्डल के अलावा बिजौलियां के भोपतपुरा में शंभूलाल धाकड़ भी इसकी खेती कर रहा है। सितम्बर-अक्टूबर में पौधा लगाते हयिा जाता है। नवम्बर से फूल आने लगते तथा अप्रेल तक इसकी फसल आती है।

 

ढंकने से फल एक माह पहले आ जाते

 

मैदानी क्षेत्रों में सिर्फ सर्दियों में इसकी एक फसल ले सकते हैं। पौधे सितम्बर-अक्टूबर में लगाते है। इन्हें शीतोष्ण क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है। फल नवम्बर-दिसम्बर में तैयार हो जाते है। दिसम्बर से फरवरी तक स्ट्रॉबेरी की क्यारियां प्लास्टिक शीट से ढंकने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं और उपज भी 20 प्रतिशत बढ़ जाती है।

 

कम खर्च में अधिक मुनाफा

 

जिले में पहली बार स्ट्रॉबेरी की खेती होने लगी है। इसके लिए कुछ किसान ही सामने आए है। लेकिन कम खर्च में अधिक मुनाफे की फसल साबित हो रही है।
रामकिशोर मीणा, सहायक उपनिदेशक उद्यान विभाग

Suresh Jain Reporting
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