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समय, सावधानी का ध्यान रखकर बनाएं कार्य को सफल: आचार्य विद्यासागर

आचार्य विद्यासागर महाराज ने बताया कि असावधानी अथवा ज्ञान के अभाव तथा कर्मो के तीव्र उदय से प्रकाश की चकाचौंध नहीं दिखाई देते है। बिजली चमक गई, उसे पकड़ नहीं सकते हो, इसी तरह जाने वाले समय को मुट्ठी में बंद नहीं किया जा सकता है। 

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Manish Geete

Jan 14, 2017

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सिलवानी/भोपाल। श्रावक को समय का ध्यान रखते हुए सावधानी पूर्वक कार्य प्रारंभ करने के साथ ही पूर्ण करना चाहिए। सावधानी पूर्वक किया गया कार्य श्रावक के जीवन में समरसता उत्पन्न करने के साथ ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता हासिल करता जाता है, जबकि असावधानी और समय के विपरीत ध्यान रख कर कार्य करने से नुकसान ही नुकसान होता है। कार्य में बाधा भी उत्पन्न होती है।

यह बात आचार्य विद्यासागर महाराज ने शुक्रवार से प्रारंभ हुए छह दिवसीय श्री मज्जिनेंद्र जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा एवं पंच गजरथ महोत्सव तथा विश्व शांति महायज्ञ के पहले दिन गर्भ कल्याणक को समझाते हुए कही। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक उपस्थित रहे।

आचार्य विद्यासागर महाराज ने बताया कि असावधानी अथवा ज्ञान के अभाव तथा कर्मो के तीव्र उदय से प्रकाश की चकाचौंध नहीं दिखाई देते है। बिजली चमक गई, उसे पकड़ नहीं सकते हो, इसी तरह जाने वाले समय को मुट्ठी में बंद नहीं किया जा सकता है।

कार्य संकल्प की भावना के साथ किया जाना चाहिए। ऐसा किए जाने से कार्य के प्रति किया गया संकल्प कार्य में सफलता दिलाता है। श्रावक को चाहिए कि वह अपना जीवन विधान के योग्य बनाए, संस्कार से ही ऐसा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गर्भ कन्याणक महापुरुषों का होता है, प्रत्येक व्यक्ति का नहीं होता है।

यह ऐसा पुण्य है कि देव भी उत्सव मनाने आते हैं। कल्पना के माध्यम से, रहस्य क्या है इसका चिंतन किया जाना चाहिए। चिंतन करने से कई सवाल मानस पटल पर उठते हैं जिनका जवाब भी मिल सकता है। यहां पर पंच कल्याणक के पात्रों की भूमिका को भी विस्तार से बताया गया।

'यह शरीर एक किराए का घर है'
बरेली. जिसे तुम अपना मान रहे हो, अव अपना नहीं है और जो अपना है, उसे अपना नहीं मानना ही जीवन की सबसे बडी बिडम्बना है। आदमी घर, फैक्टरी, पत्नी, बेटा, पोता, पोती, जेवर, गाड़ी को अपना मानने की बड़ी भूल करता है। संसार की सभी वस्तुएं रिश्ते, नाते सब यहीं छूट जाते हैं फिर भी आदमी उन्हीं सब में जीवन पर्यन्त उलझा रहता है।

उक्त मंगल उदगार जैन मंदिर में विराजमान 108 आचार्य आर्जव सागर महाराज ने धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अपनी सुख सुविधाओं, ऐसी आराम पर गर्व की अनुभूति करता है। अपनी शान दिखाने में दूसरों को तुच्छ समझ रहा है, यदि नेता वन गया तो अभिमान हो गया, बड़ा पद मिल गया तो घमण्डी हो गया। संसार के सुख, वैभव इतने प्रिय हो गए कि उनमें आशक्ति बढऩे लगी। पर वस्तुओं में ही सारा जीवन निकल रहा है। जो आत्मा अपनी है, उसे अपना नहीं मान कर शरीर को अपना मान रहा हैं।

शरीर तो किराए का घर है, एक न एक दिन तो छोडऩा ही पड़ेगा, मौत जब आती है तो सभी रिश्ते नाते, वस्तुएं, यहां तक कि शरीर भी छूट जाता है। आचार्य श्री ने कहा संसार परिभ्रमण का कारण मोह और माया है। किराए के घर में रहने वाले व्यक्ति को किराया देना ही पड़ता है, इसी प्रकार शरीर को भी भोजन पानी रूपी किराया देना ही पड़ता है। लेकिन हम इस किराए के घर के मालिक बन बैठे हंै, यह नादानी है।

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