
amazing art painting
भोपाल। महाराष्ट्र-गुजरात बॉर्डर पर बसा तलसरी गांव बहुत छोटा सा गांव है, लेकिन इसने करीब दो हजार साल पुराने ट्रेडिशन को आज भी जिंदा रखा हुआ है। पहले गाय के गोबर और मिट्टी से घर की दीवारों पर चित्रकारी की जाती थी। इसमें चावल के पेस्ट का यूज किया जाता था। पहले ये ट्रेडिशन कई राज्यों में था, लेकिन समय के साथ कलाकारों ने दूसरे पेशे को अपना लिया। तलसरी गांव में सौ कलाकार आज भी गोबर और मिट्टी के बेस पर पेंटिंग कर इस ट्रेडिशन को देश-विदेश तक पहुंचा रहे हैं।
ट्रेडिशनल आर्ट है वारली आर्ट
भोपाल हाट स्थित आदि महोत्सव में नरेश गौए और दिलीप बहौटा महाराष्ट्र से आए हैं। नरेश का कहना है कि वारली आर्ट एक ट्रेडिशनल आर्ट है। एक पेंटिंग तैयार करने में दो दिन से एक माह तक का समय लग जाता है। इस आर्ट में बस इतना चेंज हुआ कि चावल के पेस्ट की जगह पोस्टर कलर का यूज किया जाने लगा है। चावल का पेस्ट कुछ ही दिनों में गिर जाता है, जबकि पोस्टर कलर हमेशा स्थायी रहता है। इसलिए इसका यूज किया जाता है।
तीन लेयर में तैयार करते हैं बेस
नरेश का कहना है कि सबसे पहले गोबर को सुखा लिया जाता है। फिर इस सूखे हुए गोबर को पहले छाना जाता है। इसके पेस्ट में फेविकोल मिलाया जाता है।इस पूरे प्रोसेस को करने के बाद नॉर्मल शीट पर इसकी तीन लेयर चढ़ाई जाती है। सूखने के बाद इस पर पोस्टर कलर की मदद से डिफरेंट पेंटिंग्स तैयार की जाती है। काली, पीली और लाल मिट्टी को छानकर इसका लेप तैयार किया जाता है। इसमें भी फेविकोल मिलाया जाता है ताकि ये सूखने के बाद पपड़ी बनकर पेपर पर से उखड़े नहीं। इस पर सिटी कल्चर, गांव, खेती-किसानी और नेचर पर पेंटिंग्स तैयार करते हैं। इन पेंटिंग्स की इन दिनों काफी डिमांड है।
Published on:
26 Dec 2017 02:56 pm
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