
त्वचा रोग और हाइपरटेंशन की बीमारी से जूझ रहे बैगा आदिवासी
भोपाल. मप्र में संरक्षित बैगा जनजाति के लोगों को उनके जड़ी-बूटियों की पहचान की और उपयोग की क्षमता के चलते प्राकृतिक वैद्य माना जाता है, पर प्रशासनिक अनदेखी के चलते ये वर्ग मौजूदा समय में कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है। हालात ये हैं कि बैगा जनजाति बाहुल्य जिले मंडला के दूरदराज के गांवो में आदिवासी हाइपरटेंशन, त्चचा रोग समेत टीबी और रक्त की कमी से होने वाली समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसका खुलासा आइसीएमएआर जबलपुर के रिसर्च फैलो द्वारा की गई शुरुआती रिसर्च में हुआ है। इसके पहले एम्स भोपाल द्वारा किए गए भ्रमण में भी ये समस्याएं सामने आई थीं। डिंडौरी जिला मुख्यालय से तकरीबन 53 किमी दूर बजाग विकासखंड के कई गांवों में 18 से 60 आयु वर्ग के 60 फीसदी लोग हाइपरटेंशन के शिकार हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में बच्चे समेत युवा और बुजुर्ग त्वचा संबंधी रोगों से ग्रसित हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ये बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं। डिंडौरी के बाद मंडला में भी रिसर्च वर्क शुरू किया गया है। यहां भी कमोबेश यही समस्याएं सामने आई हैं। बता दें, मप्र में बैगा आदिवासियों की बड़ी आबादी डिंडौरी और मंडला जिले के दूरदराज के गांवों में रहती है। ये वन उपज पर निर्भर रहते हैं। आइसीएमआर जबलपुर ने वर्ष 1987-88 में भी इन क्षेत्रों में सर्वे कराया था। उस दौरान भी बैगा आदिवासियों में त्वचा संबंधी बीमारियां सामने आई थीं। हालांकि उस समय हाइपरटेंशन की समस्या नहीं थी।
दूषित पेयजल और खाने में अधिक नमक बना परेशानी
शुरुआती रिसर्च में पता चला कि बजाग विकासखंड के खमरेा, टरच और जलद बोना समेत तकरीबन एक दर्जन गांव में रहने वाले बैगा आदिवासी दूषित पेजयल और बेहतर हाइजीन नहीं होने की वजह से त्वचार रोग का शिकार हुए हैं। प्रारंभिक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने से त्वचा रोग लगातार बढ़ रहा है। यहां अधिकतर जगह पर शुद्ध पेजयल मुहैया नहीं है। ग्रामीण पुराने कुओं और गहरे गड्ढों से निकलने वाले पानी का उपयेाग करते हैं। इसी तरह भोजन में पर्याप्त पोषण नहीं मिलने और नमक का अधिक उपयोग करने से बड़ी आबादी हाइपरटेंशन का शिकार है। इससे लकवा जैसी समस्या आम है।
बीमारियां बढऩे की ये हैं मुख्य वजह
-दूषित पेजयल का उपयोग।
-पर्याप्त पोषण न मिलना।
-हाइजीन की व्यवस्था नहीं होना।
-प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त स्टाफ की कमी।
-शासन से मिले राशन का उपयोग भोजन के रूप में नहीं करना।
-प्रोटीन आधारित खाद्य सामग्री की कमी।
-कोदो-कुदकी का उपयोग खुद के लिए करने की बजाय इसे बेचकर जीवन यापन करना।
Published on:
26 Mar 2022 12:10 am
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