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वॉर जोन कल्पनाओं से परे, हमें दुश्मन देश की और उन्हें हमारी स्ट्रेटजी के बारे में कुछ पता नहीं होता

संजय कहते हैं कि वॉर जोन कल्पनाओं से परे होता है। वहां के हालात हर पल बदलते रहते हैैं। क्योंकि हमें दुश्मन देश की और उन्हें हमारी स्ट्रेटजी के बारे में कुछ पता नहीं होता। युद्ध शुरू होने से पहले हम लोगों में भी डर होता है। एक-दूसरे को अपने घर की बातें और जिंदगी के कुछ किस्से सुनाते हैैं। परंतु जैसे ही गोली चलना शुरू होती है, दिमाग चलना बंद हो जाता है और सामने वाले को मारना ही एक लक्ष्य दिखाई देता है।  

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भोपाल

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Anjali Tomar

Apr 17, 2023

भोपाल. 4 जुलाई 1999 को जब चौकी नंबर 4875 पर हमले के लिए आगे बढ़े तो एक जगह से दुश्मन ओटोमेटिक गन से जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी और हमें टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसे में तय किया कि उस ठिकाने को अचानक हमले से खामोश करा दिया जाए। इस दौरान आमने-सामने की मुठभेड़ में तीन पाकिस्तानियों को मार गिराया और उसी जोश में गोलाबारी करते हुए दूसरे ठिकाने की ओर बढ़े। इस मुठभेड़ मुझे भी गोली लगी, लेकिन हार नहीं मानी। हमारी और से गोलाबारी के बाद दुश्मन बौखला कर भाग खड़ा हुआ और अपनी यूनीवर्सल मशीनगन भी छोड़ गए। यह कहना है परमवीर चक्र से सम्मानित सूबेदार मेजर संजय कुमार का। इस दौरान उन्होंने पत्रिका से खास बातचीत में कारगिल युद्ध की अविस्मरणीय यादों को साझा किया।

– दुश्मनों के बंकर में फेंका ग्रेनेड

संजय ने बताया कि जितनी भी वॉर होती हैैं, उन्हें रात के अंधेरे में ही लड़ते हैं, लेकिन कारगिल की ऐसी पहली वॉर थी, जिसे हमने दिन में लड़ा। चुपके से हम उनके बंकर के पास पहुंचे थे। और वहीं से लड़ाई लड़ी जो बहुत रिस्की थी। पहले हमने बंकर में ग्रेनेड फेंका और फिर उनपर फायरिंग कर पीछे किया था।

– अग्निवीर के नतीजे आने वाले समय में पता चलेंगेअग्निवीर के तहत भर्ती की प्रक्रिया सामान्य प्रक्रिया जैसी ही है। ये योजना कितनी कारगर साबित होगी। इसका पता आज से 3-4 साल बाद ही चल पाएगा। क्योंकि बदलाव शुरू में कठिन लगते हैैं, परंतु कुछ समय बाद जब वे नतीजा देते हैैं तो सुखद हो जाते हैैं।