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भारत भवन : एकाग्र समारोह में फिल्म आर-पार का प्रदर्शन

सेंसर बोर्ड ने लगा दी थी गाने पर आपत्ति

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भारत भवन : एकाग्र समारोह में फिल्म आर-पार का प्रदर्शन

भेपाल। भारत भवन में गुरुदत्त अभिनीत एवं निर्देशित फिल्मों पर केंद्रित समारोह एकाग्र में दूसरे दिन फिल्म आर-पार का प्रदर्शन किया गया। 1954 में बनी इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक और हीरो गुरू दत्त थे। फिल्म एक हल्की फुल्की कॉमेडी फिल्म थी। श्यामा, शकीला, जॉनी वॉकर, जगदीप आदि इस फिल्म के अन्य कलाकार थे।

इसके संगीतकार ओपी नय्यर थे। 'आर-पार' फिल्म की रिलीज डेट घोषित हो चुकी थी। सेंसर बोर्ड के पास सर्टिफिकेशन के लिए जब इसे पेश किया गया तो बोर्ड ने आपत्ति लगा दी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर’ शमशाद बेगम की आवाज में था। इसे जगदीप पर फिल्माया गया था। जगदीप उस समय किशोर थे। बच्चों के गीत तो महिला गायिकाओं द्वारा गाए जाते थे पर किशोरावस्था वाले जगदीप पर शमशाद बेगम का गाया गीत सेंसर बोर्ड को ठीक नहीं लगा।

बोर्ड के सदस्यों ने गुरुदत्त को सलाह दी कि गीत को किसी महिला कलाकार पर फिल्मा लिया जाए तो गीत पास कर दिया जाएगा। गुरुदत्त ने तत्काल निर्णय लेते हुए गीत उन पर फिल्मा कर एडिटिंग से उसके टुकड़े पुराने गीत में जोड़ दिए और फिल्म को निश्चित डेट पर रिलीज किया।

'विलुप्त होती जनजातीय गुदना प्रथा' पुस्तक का विमोचन

मानव संग्रहालय के पूर्व टेगौर स्कॉलर, बंसत निरगुणे द्वारा लिखित पुस्तक ‘विलुप्त होती जनजातीय गुदना प्रथा’ का शनिवार को विमोचन किया गया। इस अवसर पर बसंत निरगुणे ने गुदना प्रथा पर किए गए शोधकार्य को साझा किया। उन्होंने बताया कि जनजातियों में विलुप्त होती गुदना-प्रथा पर शोध कार्य ? करने में प्रमुख जनजातियों गोंड, बैगा, भील, भारिया, सहरिया, कोल और कोरकू को चुना गया था।

इसका कारण है कि इन जनजातियों के गुदने एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। सभी के अर्थ और मान्यताएं अलग हैं। शेष जनजातियों के गुदने इन्हीं गुदनों से प्रभावित हैं। गुदनों के समग्र अध्ययन के लिए इन सातों जनजातियों के गुदनों से बाहर कुछ भी देखने की आवश्यकता नहीं है।