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अब भावांतर योजना दबा रही किसानों का गला…

प्रदेश में सबसे ज्यादा सोयाबीन कहां होती है? जाहिर है उत्तर होगा मालवा में, लेकिन कृषि विभाग व उसकी भावांतर योजना इस जवाब का कुछ उल्टा ही बताते हैं

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आलोक पण्डया@भोपाल। प्रदेश में सबसे ज्यादा सोयाबीन कहां होती है? जाहिर है उत्तर होगा मालवा में, लेकिन कृषि विभाग व उसकी भावांतर योजना इस जवाब का कुछ उल्टा ही बताते हैं। भावांतर योजना के मुताबिक प्रदेश में सबसे ज्यादा सोयाबीन ग्वालियर-चंबल अंचल के मुरैना, भिंड और ग्वालियर में होती है, जबकि खुद विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि वहां का उत्पादन नाम मात्र है। भावांतर के आंकड़ों में सिर्फ सोयाबीन में ही विसंगति नहीं, बल्कि मूंग, उड़द, रामतिल और मूंगफली के उत्पादन में भी गडबडझाला है। भोपाल, विदिशा और सीहोर जैसे जिलों में मूंग के लिए सरकार भावांतर में 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से अंतर का पैसा देगी, जबकि यहां के किसानों का दावा है कि यहां पर औसतन 10 से 12 क्विंटल मूंग एक हेक्टेयर में होती है।

क्लायमेटिक जोन में गुना जिला था इसलिए हुआ ऐसा...
राज्य सरकार ने किसानों को बाजार मूल्य व समर्थन मूल्य के अंतर का पैसा देने के लिए भावांतर योजना लागू की। इसमें हर जिले में खरीफ की 8 फसलों का प्रति हेक्टे. औसत उत्पादन तय किया है। सरकार इसी हिसाब से भावांतर का पैसा किसानों को देगी, लेकिन यहीं पर कई जिलों में भारी चूक हुई। अब भावांतर में दावा है मुरैना, भिंड व ग्वालियर जैसे जिलों में 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सोयाबीन का उत्पादन होता है। इसके उलट सरकार के आंकड़े बताते हैं कि इन जिलों में ५ वर्ष के दौरान सोयाबीन उत्पादन या तो शून्य रहा या नाममात्र का।

उधर रतलाम, उज्जैन, शाजापुर व देवास जैसे जिले जिनमें बंपर उत्पादन होता है वहां 16 क्विंटल प्रति हेक्टयेर की दर से सोयाबीन का भावांतर पैसा देना तय किया है। इससे मालवा के किसानों को प्रति हेक्टेयर 2 क्विंटल की धनराशि का नुकसान होगा। दरअसल प्रदेश के 51 जिलों को 11 एग्रो क्लायमेटिक जोन में बांट कर उत्पादन तय करने के कारण ऐसा हुआ है। मप्र के गिर्द नामक एग्रो क्लायमेटिक जोन में पांच जिले शामिल किए गए हैं, जिसमें मुरैना, भिंड, श्योपुर, ग्वालियर और गुना शामिल हैं। चूंकि गुना में सोयाबीन का क्षेत्र ज्यादा है इसलिए सरकार ने दूसरे जिलों में भी ज्यादा उत्पादन मान लिया है।

भावांतर का प्रावधान

सरकार ने बाजार मूल्य व समर्थन मूल्य के अंतर का पैसा किसानों को देने का ऐलान किया है। इस योजना में किसान को किसी फसल का उतना ही अंतर का पैसा मिलेगा जितना उत्पादन प्रति हेक्टेयर उसके जिले में तय किया है। यदि किसान के खेत में ज्यादा फसल हुई और उसने ज्यादा बेची भी तो भी उसे अंतर का पैसा प्रति हेक्टेयर उत्पादन के आधार पर ही मिलेगा। सरकार का दावा है कि उसने पिछले पांच साल के उत्पादन के आंकड़ों के आधार पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन तय किया है।

* किसानों से सरकार छल कर रही है। कम उत्पादन बताने से किसानों को भावांतर का पैसा कम मिलेगा ही, भविष्य में अगर फसल बर्बाद हुई तो बीमा कंपनियां इन्हीं आंकड़ों के आधार पर ही क्लेम देगी। इसमें सुधार जल्द होना चाहिए।
- शिवकुमार शर्मा कक्काजी, अध्यक्ष, राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ

* मुरैना, भिंड और ग्वालियर में सोयाबीन नहीं होता है। सरकार सिर्फ कागजों पर योजनाएं बनाती है। उन्हें व्यवहारिकता की जमीन पर जा कर देखना चाहिए। सरकार किसानों के नाम पर किसे फायदा देना चाहती है, पता नहीं।
- दिनेश गुर्जर, अध्यक्ष किसान, कांग्रेस मप्र

* हमने प्रदेश को 11 एग्रो क्लायमेटिक जोन में बांटा है। हर जोन में अगर एक भी जिले में किसी फसल का ज्यादा उत्पादन हुआ है तो उसे आधार बनाकर पूरे जोन में लागू किया है। कई जगह कम उत्पादन नजर आ रहा है, लेकिन यह पांच साल के क्रॉप कटिंग आंकड़ों के आधार पर है।
-डॉ. मोहन लाल मीणा, संचालक कृषि