
एक किस्सा लोकसभा का: एक चिट्ठी जिसने बदल दी थी सियासत पर 1984 में पहली बार लौटी थी बैरंग
भोपाल. अगर आप फिल्मों के शौकीन होंगे तो एक गाना जरूर सुना होगा। गाना था चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है। आप सोच रहे होंगे डिजिटल इंडिया के दौरे में हम आपको चिट्ठी के दौर में क्यों ले आए। तो हम बताते हैं कि हम आपको चिट्ठियों के दौर में क्यों लेकर आए हैं। मध्यप्रदेश की सियासत में कभी चिट्ठियों का दौर था। ग्वालियर के जय विलास पैलेस से एक चिट्ठी निकलती थी और चुनावी रूख बदल जाता था। ऐसी ही चिट्ठी 1984 में भी जारी हुई थी। पर पहली बार यह चिट्ठी बेरंग हो गई थी और सियासत में भूचाल आया था। ध्यान रखिए भूचाल आया था भूकंप नहीं।
एक मुलाकात जिसने बदल दी सियासत
आज हम बात करेंगे चंबल की तासीर से जुड़ी एक और संसदीय सीट भिंड-दतिया लोकसभा सीट की। इस सीट से पहले एक मुलाकात का जिक्र जरूरी है। साल था...1967। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने थे। चुनाव से पहले पंचमढ़ी में युवक कांग्रेस का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन का उद्घाटन करना था इंदिरा गांधी को। राजमाता विजयाराजे सिंधिया इसी सम्मेलन में द्वारिका प्रसाद मिश्र से मिलने पहुंची थीं। द्वारिका प्रसाद मिश्रा यानि डीपी मिश्रा उस वक्त मध्यप्रदेश के सीएम थे। राजमाता विजयाराजे को 10 से 15 मिनट तक इंतज़ार करने को कहा जाता है। इंतजार का वक्त देने की बात सुनकर राजमाता को बुरा लगता है। राजमाता ने इस इंतज़ार का मतलब निकाला था कि डीपी मिश्रा ने महारानी को अपनी हैसियत का एहसास कराया है। विजयाराजे सिंधिया ग्वालियर वापस पहुंचती हैं। इस मुलाकात को याद रखियगा। मध्यप्रदेश की सियासत और चिट्ठी की कहानी इसी मुलाकात का आधार था।
पहली बार चुनाव हारीं थी वसुंधरा राजे सिंधिया
पर बात पहले 1984 की। भिंड लोकसभा सीट पर भाजपा ने वसुंधरा राजे सिंधिया को उम्मीदवार बनाया। वही वसुंधरा राजे जो राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री बनी और राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री भी थीं। राजमाता के कहने पर वसुंधरा ने भिंड लोकसभा से चुनाव लड़ा। परिणाम घोषित हुए। नतीजा राजमाता के खिलाफ था। वुसंधरा राजे सिंधिया 87 हजार मतों से चुनाव हार जाती हैं। ये वसुंधरा की पहली और अब तक की एक मात्र हार है और हराया था कांग्रेस के कृष्ण सिंह ने। ये वो दौर था जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया चिट्ठी जारी करती थी और चिट्ठी में लिखा होता था यह हमारा उम्मीदवार है और नेता चुनाव जीत जाते थे पर राजमाता की चिट्ठी भी वसुंधरा की हार नहीं डाल पाई थीं और ये वही वह चिठ्ठी थी जो बैरंग लौटकर आई थी। वसुंधरा हार के बाद राजस्थान चली जाती हैं।
कब आस्तित्व में आई थी भिंड लोकसभा सीट
विजयाराजे सिंधिया की हार भिंड लोकसभा सीट की सबसे ऐतिहासिक हार मानी जाती है। क्योंकि यहां कहने को तो उम्मीदवार वसुंधरा राजे थे पर सही मायने में चुनाव लड़ी था राजमाता ने। भिंड में पहली बार 1952 में चुनाव हुए थे। उसके बाद यहां कोई चुनाव नहीं हुआ लेकिन 1962 के चुनाव से पहले देश में परिसीमन हुआ और भिंड लोकसभा सीट भिंड-दतिया के नाम से आस्तित्व में आई। 1962 में यहां से कांग्रेस के सूरज प्रसाद ने जीत दर्ज की। यह सीट धीरे-धीरे कांग्रेस का गढ़ बन चुकी थी। 1962, 1967 और 1971 में लगातार कांग्रेस ने यहां से जीत दर्ज की थी। राजमाता विजयाराजे सिंधिया को अपने क्षेत्र में कांग्रेस का दबदबा नागवार गुजरा। 1977 में एक बार फिर चुनाव होते हैं। राजमाता विजयाराजे सिंधिया भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरती हैं। कांग्रेस के नससिंह राव दक्षित को बड़े अंतर से चुनाव हराया। इसी एक हार से कांग्रेस इस सीट पर कमजोर होती चली गई। लेकिन 1980 और 84 में कांग्रेस वापसी करती है। क्योंकि तब तक जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बना चुका था।
भाजपा को पहली बार मिली जीत
साल 1989 के चुनाव में बीजेपी ने यहां से उम्मीदवार बदल दिया। बीजेपी ने इस बार नरसिंह राव दीक्षित को मौका दिया। ये वही नरसिंह राव दीक्षित हैं जिन्हें राजमाता ने चुनाव हराया था। उन्होंने पार्टी को निराश नहीं किया ये बीजेपी की यहां पर पहली जीत थी। इस जीत के साथ ही ये सीट भाजपा का गढ़ बन गई। 1989 से 2014 यहां लगातार भाजपा जीतती रही। 1996 से 2004 के बीच देश में चार बार लोकसभा चुनाव हुए। इस सीट पर चारों बार भाजपा के रामलखन सिंह चुनाव जीतते रहे जो इस सीट का एक रिकॉर्ड है। भिंड लोकसभा सीट के अंतर्गत 8 विधानसभा सीटें आती हैं। अटेर, भिंड, लहार, मेहगांव, गोहद, सेवढ़ा, भाण्डेर और दतिया।
कब कौन बना इस सीट से सांसद
1962 कांग्रेस के सूरज प्रसाद
1997 में कांग्रेस के यशवंत सिंह
1971 में कांग्रेस के गंगाचरण दीक्षित
1977 में भारतीय जनसंघ की विजयाराजे सिंधिया
1980 इंदिरा कांग्रेस के कालीचरण शर्मा
1984 में कांग्रेस के कृष्ण पाल सिंह
1989 में भाजपा के नरसिंह राव दीक्षित
1991 में भाजपा के योगानंद सरस्वती
1996 से 2004 तक भाजपा के रामलखन सिंह
(चार बार यहां से लगातार चुनाव जीते)
2009 में भाजपा के अशोक अर्गल
2014 में भागीरथी प्रसाद सिंह
भिंड लोकसभा सीट जातिगत में समीकरण
चंबल और बीहड़ से घिरी भिंड सीट पर राजनीति का केन्द्र हैं ब्राह्मण और ठाकुर। यहां हार जीत इन्हीं वर्ग के मतताता तय करते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक भिंड लोकसभा सीट की कुल आबादी करीब 24 लाख 89 हजार 759 थी। 75.3 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्र और 24.7 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है। भिंड में 23.1 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है।
कैसे भाजपा का गढ़ बनी ये सीट
1989 में जीत दर्ज करने बाद भाजपा यहां से कभी नहीं हारी। कहते हैं ये सीट भी चंबल के मुरैना लोकसभा सीट की तरह ही विपरीत धारा में बहती हैं। यहां जीत उसी पार्टी की होती है जो ब्राह्मण और ठाकुर वोटों को साध लेते हैं। रामलखन सिंह यहां से चार बार लगातार सांसद रहे। रामलखन सिंह के बार में कहा जाता है। जनता से मिलते थे पर काम बहुत कम करते थे। फिर भी चुनाव जीतते थे क्योंकि ठाकुर थे। बाकि जातियों के भी वोटों को साध लेते थे। वहीं, कांग्रेस को हर बार नुकसान होता था धारा के विपरीत हवा से। सत्यदेव कटारे और गोविंद सिंह जैसे कद्दावर नेता कांग्रेस के पास थे फिर भी कांग्रेस यहां जीत नहीं पाई।
गिरा दी थी डीपी सिंह की सरकार
हमने एक मुलाकात और चिठ्टी का जिक्र किया था। मुलाकात तो बता दी अब चिट्ठी का असर भी जान लीजिए। मध्यप्रदेश में 1967 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत होती है। डीपी मिश्रा फिर से सीएम बनते हैं। वही डीपी मिश्रा जो राजमाता को 10 मिनट इंतजार करने को कहते हैं। 10 मिनट के इंतजार की खार का बदला लेने का वक्त अब राजमाता का था। राजमाता कांग्रेस विधायकों को चिट्ठी लिखती हैं। विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ होते हैं। डीपी मिश्रा की सरकार गिर जाती है। राजमाता को सीएम बनाने की आवाज उठती है। राजमाता इंकार कर देती हैं। कांग्रेस के ही विधायक गोविंद नारायण सिंह को मध्यप्रदेश का सीएम बना दिया। ये बदला था उस 10 मिनट के इंतजार को जो डीपी मिश्रा को सत्ता से बेदखल कर गया। ये चिट्ठी का असर था और हमने शुरुआत में इसलिए चिट्ठी का जिक्र किया था।
एक नजर मौजूदा संसद पर
2019 में फिर से एक बार चुनाव है। 2014 में सांसद बनने के बाद डॉ. भागीरथ प्रसाद एक बार फिर से दावेदारों की लिस्ट में हैं। भागीरथ प्रसाद मध्य प्रदेश के 1975 बैच के आईएएस रहे हैं। प्रसाद नौकरी के बाद 2 साल तक देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। पहली बार उन्होंने 2009 में भिंड से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा हार मिली। 2014 में भाजपा में आए। मोदी लहर ने नौका पार लगाई पर संसद पहुंच गए। संसद में डॉ.भागीरथ प्रसाद की उपस्थिति 85 फीसदी रही। 26 बहस में हिस्सा लिया। 74 सवाल भी पूछे। संसद निधि का 88.75 फीसदी खर्च किया। भाजपा की तरफ से इस बार यहां से सांसद डॉ. भागीरथ प्रसाद के अलावा पूर्व सांसद और मुरैना महापौर अशोक अर्गल, पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य और पूर्व विधायक ओमप्रकाश खटीक का नाम पर है। वहीं, कांग्रेस में डॉ. सीमा महंत के अलावा पूर्व मंत्री महेंद्र बौद्व, जिला पंचायत अध्यक्ष रामनारायण हिंडौलिया, इंजीनियर सुनील शेजवार, पूर्व विधायक कमलापत आर्य जैसे नेताओं का नाम शामिल हैं।
भिंड की एक अलग पहचान
खैर राजनीति से थोड़ा आगे चलते है। भिंड अपनी कलात्मक सौन्दर्य और वास्तु सुंदरता के लिए जाना जाता है। यह शहर चंबल नदी के बीहड़ के लिए भी प्रसिद्ध है, जहां एक दौर में डाकुओं का राज़ रहा था। भिंड का नाम भदावर वंश राजाओं के राज करने के कारण पड़ा। यहां पहले भदावर वंश का राज था लेकिन बाद में सिंधिया वंश का यहां दबदबा रहा।
Published on:
24 Feb 2019 10:24 am
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